इंसानियत की मिसाल डॉ ‘मौलाना’ कल्बे’ ‘सादिक़’ और इंसानियत के सवाल ?

लेखक : सैयद इब्राहिम हुसैन (दानिश हुसैनी)

क्या आप बता सकते हैं कि आज दुनिया की 8 बिलियन आबादी में कितने ऐसे धार्मिक चेहरे होंगे कि जिन्हें दूसरे धर्म वाले भी सम्मान की नज़र से देखते और उनकी बातों को स्वीकार करते हों..??

चलिए मैं अपने सवाल को और छोटा कर देता हूं चलिए अब आप बताइए कि आज के इस नफ़रत भरे भारत में कितने ऐसे इस्लामिक धर्मगुरु होंगे कि जिनके किरदार को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और फर्जी़वाड़े का राजनीतिक ज़हर भी नहीं मार सका.. ??

जी हां मैं बात कर रहा हूं 135 करोड़ की आबादी वाले आज के नए भारत की अनोखी मिसाल डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की श्रेणी में मौजूद दूसरे सर सैयद अहमद ख़ान शिया धर्मगुरु डॉ मौलाना कल्बे सादिक़ साहब की..

जी हां ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के वाइस चेयरमैन के साथ ही लखनऊ के एरा मेडिकल कॉलेज के प्रेसिडेंट और हिजा़ चैरिटेबल हॉस्पिटल के संस्थापक मुस्लिम समुदाय में हकीमे उम्मत कहे जाने वाले मरहूम मौलाना कल्बे सादिक़ साहब किसी पहचान के मोहताज नहीं है..

उनकी पहचान के लिए बस इतना ही काफी है कि सुपर पावर होने का दावा करने वाले अमेरिका को भी उनके अमेरिका में दाख़िल होने से डर लगने लगा और उसे पहले भी कई बार अमेरिका विजि़ट कर चुके डॉक्टर साहब को वैलिड वीजा के बावजूद लंदन डिपोर्ट करना पड़ गया..

1984 में ज़रूरतमंद बच्चों की मदद के लिए तौहीद उल मुस्लिमीन ट्रस्ट की नींव रखने वाले मौलाना कल्बे सादिक़ ने अपने ख़्वाबों की इमारतों को सिर्फ बनाया ही नहीं बल्कि उन्हें संभाला और संवारा भी..

बल्कि सच तो यह है कि हमेशा ग़रीबी की नक़ाब में छिपने वाला भारतीय मुसलमान उनके सस्ते या मुफ़्त यूनिटी सीरीज़ के एजुकेशनल सेंटर्स या फिर अलीगढ़ के एम यू कॉलेज को चाह कर भी अनदेखा नहीं कर सकता..

अलबत्ता डॉक्टर साहब ने सिर्फ़ एजुकेशन पर ही काम नहीं किया बल्कि उन्होंने विधवाओं यतीमों और लावारिसों तक भी पहुंचने की कोशिश की..

लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त मौलाना कल्बे सादिक़ साहब के जीवन के कुछ अनछुए पहलू और ना बयान किए जाने वाले बयान भी हैं जिन्हें आज के इस समय में समझना किसी ग़नीमत से कम नहीं होगा..

इसी कड़ी में याद कीजिए कि यही वह मौलाना कल्बे सादिक साहब थे कि जिन्होंने मुसलमानों से बाबरी मस्जिद को हिंदुओं को दे देने की बात कही थी..

लेकिन तब बंटे रहने के आदी और इस्तेमाल होने के शौक़ीन मुस्लिम समुदाय को सस्ते और बनावटी नेताओं, दुकानदारों के फर्जी़ और मतलबी जुमले महान व्यक्ति की दूर की कौड़ी से ज़्यादा महंगे लगे..

मुझ जैसे लाखों मुसलमानों के रोल मॉडल मौलाना कल्बे सादिक़ की दूरदर्शिताओं और उच्च विचारों को गिनते हुए दिमाग़ भी थकनें लगता है..

अलबत्ता अपने महान कार्यों के बावजूद भी डॉक्टर साहब कर्बला और कूफा़ का उदाहरण रखने वाले मुसलमानों के इल्ज़ाम लगाने और अहमियत ना देने के वार से बच ना सके..

जिसके नतीजे में मौलाना को कभी एंटी मौलवी कहा गया तो कभी दरबारी मुल्ला के नाम से पहचनवाया गया..

दरअसल आज उनकी मौत पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कल उनके बाबरी मस्जिद छोड़ने, पापिस्तान कहने और तालिबानी पर्दा सिस्टम पर शबाना आज़मी के साथ देने जैसी बातों पर हंगामा करते फिरते थे..

मदरसों और मौलवियों को मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम से जुड़ने की वकालत करने वाले डॉक्टर साहब के 2007 में योगिंदर सिकंद को दिए गए इंटरव्यू को पढ़ना सोच में बदलाव लाने की शानदार वजह साबित हो सकती है..

आज पीएचडी की उपाधि रखने वाले डॉक्टर साहब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका किरदार उनके पैग़ाम कभी ना मिटने वाले हैं और ख़ास तौर पर एकता शिक्षा और सामाजिक सद्भाव के लिए किए गए उनके कामों पर होने वाली रिसरच्स अब ना जाने कितने पीएचडी धारक दिखलाने वाली हैं..!!

वैसे तो 82 साल की उम्र में भी वहीलचेयर के सहारे इंसानियत की खा़तिर एनआरसी विरोधी रैलियों के मैदान में उतर आना अपने आप में समाज में उत्साह फूकने वाली किसी जड़ी बूटी से कम नहीं है लेकिन फिर इन्हीं प्रोग्राम्स में मौजूद लोगों पर लाठियां चलवाने और ख़ास तौर पर देश और समाज के लिए बेमिसाल काम करने वाले डॉक्टर साहब के बेटे कल्बे सिब्तैन नूरी पर भारी भरकम जुर्माना लगाने वाले सीएम योगी आदित्यनाथ और इन विरोधियों को दंगाई कहने वाले और दंगाइयों को कपड़े से पहचनवाने वाले पीएम नरेंद्र मोदी का आज डॉक्टर साहब की मौत पर अफ़सोस जताना सवाल खड़ा करता है कि क्या एक पीएम और सीएम भी आतंकियों की मौत पर अफ़सोस जता सकता है??

और अगर डॉक्टर साहब और उनकी फ़ैमिली आतंकी नहीं है और इतनी ही भली है कि उसे संवेदना प्रकट की जाए तो फिर आतंकी और बुरा कौन है?

क्या वह सोच और वह लोग आतंकी और बुरे नहीं हैं कि जिन्होंने इस महान व्यक्ति के परिवार उनके साथियों और उनकी सोच को आतंकी कहने की हिम्मत की…??

क्या कोई ऊंचा पद किसी को भी आतंकी कहने का लाइसेंस दे देता है..??

जी हां 21वीं सदी के इतिहास के पन्ने इन सवालों और डॉक्टर साहब के शव की शिया और सुन्नी अलग-अलग नमाज़ होने के साथ ही कोरोना के माहौल में भी उनके पार्थिव शरीर की अंतिम यात्रा में जनसैलाब उमड़ आने के जि़क्र के बिना अधूरे ही रहेंगें…

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