रमज़ान पर विशेष ईमान और अक़ीदा,डॉ एम ए रशीद ,नागपुर

रमज़ान पर विशेष
ईमान और अक़ीदा
——— डॉ एम ए रशीद , नागपुर

जब भी हम इस्लामी शरीयत या इस्लामी विधि का शब्द बोलते हैं तो उससे अल्लाह के निर्देश और नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के उन आदेशों से तात्पर्य होता है जो नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के माध्यम से हमें मिले हैं । आज वे कुरआन व हदीस के रूप में पूर्ण रूप से हमारे दरमियान मौजूद हैं। शरीयत के माध्यम से हमें जो निर्देश हमें मिले हैं वे दो प्रकार के हैं । उनमें एक का संबंध हमारे दिल और मन से है और दूसरे का संबंध हमारे शरीर और उसके अंगों से है । जिन निर्देशों का संबंध हमारे मन और दिल से है उसको ईमानियात और एतिक़ादात कहते हैं। जिन आदेशों का संबंध हमारी करनी से है वे कई प्रकार के होते हैं। इन में वे इबादतों के आदेश , लेन देन , नैतिकता , शिष्टाचार , राजनीति , समाज और धर्म आदि रूप दिखाई देते हैं ।
ईमान की परिभाषा यह है कि जो आदेश अल्लाह के रसूल ने अल्लाह की ओर से लाए हैं उन पर दिल से विश्वास करना और ज़बान से उसकी घोषणा करने को ईमान कहते हैं। ईमान एक अरबी शब्द है, यह “अ+म+न से व्युत्पन्न शब्द अमन (शांति) बनता है । किसी भी भय से सुरक्षित हो जाने , दिल के संतुष्ट हो जाने और मानव की भलाई के साथ जुड़े रहने को अमन (शांति) कहते हैं । ईमान का शब्द जब अनिवार्य क्रिया के रूप में इस्तेमाल हो तो उसका अर्थ होता है “अमन पाना” और जब यह के सकर्मक क्रिया के तौर पर आए तो उसका अर्थ होता है “अमन देना”।
अक़ीदा प्रसिद्ध शब्द अक़्द से बना है । आमतौर पर अक़्द का शब्द निकाह के समय अक़्दे निकाह के रूप में अक्सर पढ़ने सुनने को मिलता है । परिभाषा की सीमा में यह शब्द गांठ देने या बांधने के रूप में आता है । मैं ऐसा एतिक़ाद रखता हूं , मैंने इस अक़ीदे को अपने दिल में बांध लिया है । अर्थात जब दिल में किसी वस्तु का विश्वास पूरी तरह से बैठ जाता है तो वही अक़ीदा बन जाता है। इसे ही आस्था कहते हैैं।
अल्लाह के जो आदेश और उसके जो निर्देश पैगंबर हजरत मुहम्मद स अ व पर ” क़ुरआन की वह़ी” के रूप में अवतरित हुई हैं , वे निर्देश जो पैगंबर हज़रत मुहम्मद स अ व के द्वारा हमको मिले हैं , भले ही उनका संबंध एतिक़ादात से हो या व्यवहारिक ज़िंदगी से उन पर विश्वास रखने और दिल के अंदर उसको बिठा लेने और ज़बान से उसकी अभिव्यक्ति का नाम ईमान है।
इन आदेशों और वास्तविकताओं का पुष्टिकरण और घोषणा जिनका संबंध उस हस्ती से है जिसको हमारी आंखें नहीं देख सकतीं , जिसे परोक्ष लोक ( आलमे ग़ैब) कहा जाता है । इसमें
अल्लाह की हस्ती और उसके उत्तमताओं की सच्चे होने का समर्थन , परलोक , जन्नत और नरक पर विश्वास , फ़रिश्तों पर विश्वास , भाग्य और कब्र में अज़ाब पर विश्वास आदि को ईमानियात और एतिकादात कहा जाता है। इनका संबंध व्यवहारिक कार्यशैली में दिखाई देता है।
इन आस्थाओं पर यदि कोई विश्वास न रखें यह उन आदेशों का इंकार, विरोध करे तो इन दोनों स्थितियों में वह मुसलमान नहीं रह जाता । मोमिन होने के लिए यह आवश्यक है कि वह पैगंबर हजरत मुहम्मद स अ व की लाई हुई पूरी इस्लामी शरीयत को मानता हो ‌।
मिश्कात हदीस संग्रह में हज़रत मुहम्मद स अ व की एक हदीस उल्लेखित है कि “कोई व्यक्ति उस वक्त तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक अपनी इच्छाशक्ति को मेरी लाई हुई शरीयत के वश में ना कर दे” ।
ईमान लाने का मतलब यह है कि अल्लाह तआला को एक अकेला और इबादत के योग्य माने । पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि सल्लम को अल्लाह का बंदा और उनकी पैग़म्बरी पर विश्वास करे । यह स्वीकारोक्ति इस प्रसिद्ध कलिमे से होती है , ला इला ह इल्लल्लाहू मुह़म्मदुर्रसूलुल्लाह – अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं ।
स्कूल में की गवाही इस प्रकार से है कि अशहदू अल ला इला ह इल्लल्लाहू व अशहदू अन्ना मुह़म्मदन अ़ब्दुहू व रसूलुहू मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई पूजा नहीं और गवाही देता हूं कि हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम , अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।
पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहू अ़लैहि वसल्लम फरमाते हैं कि “ईमान के 70 से ज़्यादा विभाग हैं जिनमें सर्वोच्च कलिमा ला इलाहा इल्लल्लाह की घोषणा और उससे समीप आम रास्ते से किसी क्षति पहुंचाने वाली वस्तु को हटा देना और लज्जा ईमान का हिस्सा है” (बुख़ारी , मुस्लिम) ।
ईमाने मुफ़स्सल में ईमान की बातों का इस तरह इकरार किया जाता है , वह यह है कि ” मैं ईमान लाया अल्लाह पर और उसके फ़रिश्तों पर और उसकी किताबों (ईश ग्रंथों) पर और उसके रसूलों पर और परलोक के दिन पर और अच्छी बुरी तक़दीर अल्लाह की तरफ़ से है और मृत्यु के बाद जीवित होने पर” ।
ईमान का दूसरा इक़रार “ईमाने मुज्मल” यह है कि ” ईमान लाया अल्लाह पर जैसे कि वह अपने नामों और सिफ़तों के साथ है और मैंने उसके सब हुक्म कुबूल किए”।
ईमान की इन बातों से स्पष्ट होता है कि एक मुसलमान को पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहू अ़लैहि वसल्लम ने जो कुछ भी फ़रमाया और बताया उसे सब हक और सच्चा मानना चाहिए , यह फ़र्ज़ है ।‌ आप स अ व ने जो भी ग़ैब की बातें बताई हैं जिसमें जिस्मानी मेराज का होना , क़ब्र की यातनाएं और राहतें ,कयामत के दिन की घटनाएं , जन्नत , जहन्नम की दशा आदि सब हक और सच हैं।

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