‘रमज़ान’ महिन’ पर’ ‘विशेष’,अल्लाह की हस्ती पर ईमान,एकेश्वरवाद की अवधारणा जीवन के हर एक पहलू में दिखाई देना चाहिए, डॉ एम ए रशीद

रमज़ान महिन पर विशेष

अल्लाह की हस्ती पर ईमान
— एकेश्वरवाद की अवधारणा जीवन के हर एक पहलू में दिखाई देना चाहिए
—————— डॉ एम ए रशीद , नागपुर
इस हस्ती को कौन नहीं जानता , बच्चा बच्चा इसे जानता पहचानता है , सुख में नहीं तो दुख में ज़रूर इसका नाम ज़बान पर आता है । यहां तक कि सहसा मौत के मुंह से निकलते हुए इंसान को कोई देख ले तो वह उसे सहसा कह उठता है कि ऊपर वाले ने तुझे बचा लिया । मौत के मुंह में जाने वाले की प्राण बचाने के लिए इसी हस्ती को याद किया जाता है । कोरोना महामारी से बचने के लिए हर कहीं उसी से दुआएं मांगी जा रही हैं । फिर किसी निडर , अत्याचारी व्यक्ति को इसी हस्ती का डर बताकर उसे अत्याचार , अन्याय से रोकने का प्रयास भी किया जाता है । इस हस्ती को गाॅड , ईश्वर , प्रभु , अल्लाह कहते हैं । इसी हस्ती ने ब्रह्मांड की रचना की है । इस हस्ती के संबंध में विश्व की मानवजाति ने कभी सामूहिक तौर पर किसी भी युग में उसका इंकार नहीं किया और न ही उसे नकारा है ।
पवित्र कुरआन की सुरह अंकबूत की 61 पंक्ति में है कि – और यदि तुम उनसे पूछो कि “किसने आकाशों और धरती को पैदा किया और सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगाया?” तो वे बोल पड़ेंगे, “अल्लाह ने!” फिर वे किधर उलटे फिरे जाते हैं?
और इसी सूरह की 63 पंक्ति में है कि – और यदि तुम उनसे पूछो कि “किसने आकाश से पानी बरसाया; फिर उसके द्वारा धरती को उसके मुर्दा हो जाने के पश्चात जीवित किया?” तो वे बोल पड़ेंगे, “अल्लाह ने!” कहो, “सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है।” किन्तु उनमें से अधिकतर बुद्धि से काम नहीं लेते ।
जो लोग बुद्धि से काम नहीं लेते वे अल्लाह के साथ शिर्क कर किसी दूसरे , तीसरे की बंदगी में लग जाते हैं , उनसे मन्नतें मांगते हैं और भटक जाते हैं। इस प्रकार के शिर्क अथवा बहुदेव वाद की बंदगी अल्लाह को एक पल भी बर्दाश्त नहीं । पवित्र कुरआन ने इस विचार की कठोर शब्दों में निंदा की है । उसे इतना बड़ा अत्याचार घोषित किया है कि परलोक में उसके क्षमा मिलने की कोई उम्मीद नहीं है ।
अल्लाह के साथ किसी को साथी , साझी ठहराना सबसे बड़ा अत्याचार है । इसे शिर्क कहते हैं । अल्लाह शिर्क करने वाले को कभी माफ नहीं कर सकता । अल्लाह ने इस प्रकार के शिर्क को सबसे बड़ी गुमराही , धरती पर भ्रष्ट आचार और बिगाड़ का कारण बताया है । अल्लाह ने बारंबार याद कराते हुए कहा है कि जिस प्रकार पूरे ब्रह्मांड (कायनात ) की रचना में उसका कोई साथी , साझी नहीं उसी प्रकार कायनात के प्रबंधन को भी वह एक अकेला ही उसे चला रहा है। पवित्र कुरआन की “आयतल कुर्सी” की प्रसिद्ध पंक्तियां इस अवधारणा को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करती हैं कि ‘
“अल्लाह तआला के सिवा कोई इबादत के लाएक नहीं, ज़िंदा है (जिस को कभी मौत नहीं आ सकती) , (सारी दुनिया को) संभालने वाला है। न उसे ऊंघ आती है और न नींद, उसकी मिलकियत में जमीन व आसमान की तमाम चीजें हैं। कौन शख्स है जो उसकी इजाज़त के बगैर उसके सामने शिफारिश कर सके। वह जानता है उन (कायनात) के तमाम हाज़िर और ग़ायब हालात को। वह (कायनात) उसकी मंशा के बेगैर किसी चीज़ के इल्म का इहाता नहीं कर सकते, उसकी कुर्सी की कुशादगी ने जमीन व आसमान को घेर रखा है। अल्लाह तआला को उन ( धरती और आसमान) की हिफाज़त कुछ भारी नहीं गुज़रती। वह बहुत बुलंद और बहुत बड़ा है।‘‘ ( सूरह अल बकरा आयत न॰ 255 )।
सुरह अनआम की पंक्ति क्रमांक 22 में है कि ” जिस दिन हम, सबको एकत्र करेंगे, तो जिन्होंने शिर्क किया है, उनसे कहेंगे कि तुम्हारे वे साझी कहाँ गये, जिन्हें तुम (पूज्य) समझ रहे थे?”
इसी सूरह अनआम की पंक्ति क्रमांक 59 में है कि “उसी के पास परोक्ष की कुंजियाँ हैं, जिन्हें उसके सिवा कोई नहीं जानता। जल और थल में जो कुछ है, उसे वह जानता है। और जो पत्ता भी गिरता है, उसे वह निश्चय ही जानता है। और धरती के अँधेरों में कोई भी दाना हो और कोई भी आर्द्र (गीली) और शुष्क (सूखी) चीज़ हो, वह निश्चय ही एक स्पष्ट किताब में मौजूद है।”
पवित्र कुरआन की सूरह इख्लास अल्लाह की हस्ती और शुद्ध वंदना करने से संबंधित है। इसी का दूसरा नाम तौहीद (अद्वैत) है। अल्लाह की ज़ात , गुणों से संबंधित प्रश्नों में कि वह कैसा है और किस धातु का बना हुआ है , इस सूरह में उसका जवाब मौजूद है । इस “सूरह इख्लास” का अर्थ है कि अल्लाह पर ऐसे ईमान लाना कि उस के अस्तित्व और गुणों (ज़ात) में किसी की साझेदारी की कोई आभा (झलक) न पाई जाये। और इसी को तौहीदे ख़ालिस (निर्मल ऐकेश्वरवाद) कहते हैं।
कहीं अल्लाह को मानने में ऐसा मिश्रण भी किया है कि उसे मानना और न मानना दोनों बराबर हो कर रह गये हैं। तौहीद को उजागर करने के लिये अल्लाह ने बराबर दूत भेजे परन्तु इन्सान बार बार इस तथ्य को खोता रहा।
इस सूरह की आयत 1, 2 में अल्लाह के सकारात्मक गुणों को और आयत 3,4 में नकारात्मक गुणों को बताया गया है ताकि धर्मों और जातियों में जिस राह से शिर्क आया है उसे रोका जा सके। हदीस में है कि अल्लाह ने कहा कि मनुष्य ने मुझे झुठला दिया। और यह उस के लिये योग्य नहीं था। और मुझे गाली दी और यह उस के लिये योग्य नहीं था। उस का मुझे झुठलाना उस का यह कहना है कि अल्लाह ने जैसे मुझे प्रथम बार पैदा किया है दोबारा नहीं पैदा कर सकेगा। जब कि प्रथम बार पैदा करना मेरे लिये दोबारा पैदा करने से सरल नहीं था। और उस का मुझे गाली देना यह है कि उस ने कहा कि अल्लाह की संतान है। जब कि मैं अकेला निर्पेक्ष हूँ। न मेरी कोई संतान है और न मैं किसी की संतान हूँ। और न कोई मेरा समकक्ष है। (सहीह बुख़ारी- 4974)
एक दूसरी हदीस में है कि एक व्यक्ति ने कहा कि, हे अल्लाह के रसूल! मैं इस सूरह से प्रेम करता हूँ। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः तुम्हें इस का प्रेम स्वर्ग में प्रवेश करा देगा। (सहीह बुख़ारीः 774)
इस सुरह का अर्थ यह है कि
“(हे ईश दूत!) कह दोः अल्लाह अकेला है” (1) । इस पंक्ति संख्या 1 में ‘अह़द’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिस का अर्थ है, उस का अस्तित्व एवं गुणों में कोई साझी नहीं है। यहाँ ‘अह़द’ शब्द का प्रयोग यह बताने के लिये किया गया है कि वह अकेला है। वह वृक्ष के समान एक नहीं है जिस की अनेक शाखायें होती हैं। पंक्ति संख्या 2 में ‘समद’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिस का अर्थ है अब्रण होना। अर्थात जिस में कोई छिद्र न हो जिस से कुछ निकले या वह किसी से निकले। और पंक्ति संख्या 3 इसी अर्थ की व्याख्या करती है कि न उस की कोई संतान है और न वह किसी की संतान है। “अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है”(2)। “न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है” (3)। “और न उसके बराबर कोई है”(4)।
इस पंक्ति में यह बताया गया है कि उस की प्रतिमा तथा उस के बराबर और समतुल्य कोई नहीं है। उस के कर्म, गुण और अधिकार में कोई किसी रूप में बराबर नहीं। न उस की कोई जाति है न परिवार। इन पंक्तियों में क़ुर्आन उन विषयों को जो तौह़ीद के विरुद्ध बनने का कारण बने उसे अनेक रूप में वर्णित करता है और उसका का सख़्त खण्डन भी करता है।
इंसान को यह बात स्वीकारना होगी कि पूरे ब्रह्मांड का निर्माण एक अकेली ही हस्ती ने किया है । क्योंकि वायु, जल , थल से लेकर मानव जीवन की वे सभी आवश्यकताएं प्राकृतिक रूप से उसे प्राप्त हुई हैं जिनकी पल पल उसे ज़रूरत पड़ती रहती है । इन सब में किसी दूसरी , तीसरी शक्ति का तनिक भी हाथ नहीं है । इस धारा में इंसान का फ़र्ज़ बनता है कि वह उसी एक अकेली हस्ती को नमन करे , उसके सामने अपना सिर झुकाए। इस बंदगी में किसी दूसरे, तीसरे को उस हस्ती का न तो साझी बनाए और ना ही साथी ।
इसीलिए अल्लाह की सभी इबादतों नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात आदि में जो नियतें की जातीं हैं और उन सब में जो दुआएं पढ़ी जाती हैं वे सब इसी हस्ती के अक़ीदा “अक़ीदा ए तोहिद” का मुख्य आधार और अभिव्यक्ति होती हैं। नमाज़ की तरह रमज़ान के रोज़ों की सारी अहमियत उसी वक्त है जब ईमान और मूल्यांकन के साथ रोज़ा रखा जाता है अर्थात अल्लाह के उस आदेश पर बंदे को विश्वास हो और उससे सवाब , पुण्य की उम्मीद हो।
इन सब का उद्देश्य यही है कि एक अकेली हस्ती तौहीद (एकेश्वरवाद) की अवधारणा एक मोमिन में मिलनी चाहिए । एक मोमिन परिपूर्ण मोमिन तब तक नहीं हो सकता जब तक कि उसके दिल दिमाग में एकेश्वरवाद की अवधारणा घनीभूत न हो । वह सब उसके जीवन के हर एक पहलू में दिखाई देना चाहिए । यही अल्लाह की हस्ती पर ईमान का तकाजा है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *