रमज़ान महीने पर विशेष आख़िरत पर अक़ीदा, ईमान का हिस्सा है, डॉ एम ए रशीद

रमज़ान महीने पर विशेष
आख़िरत पर अक़ीदा
यह ईमान का हिस्सा है
———– डॉ एम ए रशीद , नागपुर
एकेश्वरवाद (तोहिद) के बाद दूसरी चीज़ जिस पर मुसलमानों को ईमान लाना और उस पर पक्का विश्वास करना ज़रूरी है वह यौमे आख़िरत है । आख़िरत का अर्थ बाद में आने वाली चीज़ और यौम का अर्थ दिन और ज़माना होते हैं ।
हमारी एक जिंदगी तो वह है जिसमें इस वक्त हम रह रहे हैं उसे हम इसलिए दुनिया की जिंदगी कहते हैं कि वह हमें इस वक्त हासिल है दूसरी जिंदगी हमारी इस जिंदगी के समाप्त होने के बाद आरंभ होगी और वह जिंदगी कभी समाप्त होने वाली नहीं है इसलिए इस जिंदगी को इस्लामी शरीयत में युवाओं में आखिरत कहते हैं हमारी इस दुनिया की जिंदगी एक परीक्षा स्थल है जिसमें हम अच्छे या बुरे जो भी क्रियाएं करेंगे वहां उसका पूरा पूरा बदला मिलेगा जो लोग इस दुनिया में अच्छे कर्म करने वाले होंगे वे अल्लाह के अनंत ईशकृपा के पात्र होंगे और जो लोग इस दुनिया में बुरे होंगे वह अल्लाह की अनंत फटकार और यातनाओं के भागीदार घोषित किए जाएंगे ।
इस्लाम में आख़िरत के दिन की बड़ी अहमियत आई है । पवित्र कुरआन में जिस तरह तोहीद एकेश्वरवाद का उल्लेख बार बार आया है उसी प्रकार आख़िरत का उल्लेख भी बारंबार आया है । अल्लाह के दूतों में आदम अलैहिस्सलाम से लेकर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक जितने भी दूत इस धरती पर आए हैं उन सब ने तोहीद एकेश्वरवाद के साथ साथ आख़िरत के अक़ीदे पर लोगों को चेताया बल्कि उसको ईमान का हिस्सा बताया है । आख़िरत के दिन पर विश्वास तोहीद (एकेश्वरवाद)
का तक़ाज़ा है ।
अल्लाह अपनी तमाम शक्तियों के साथ परोक्ष के ज्ञान का मालिक और सबसे अच्छा न्याय करने वाला है । आख़िरत के दिन उसकी सभी शक्तियां और न्याय दिखाई देगा । अल्लाह पर यकीन हो जाने के बाद बंदे के अंदर यह यकीन भी पैदा हो जाता है कि इस दुनिया में हम जो भी अच्छा या बुरा करेंगे अल्लाह उस सब से परिचित है । अच्छाइ , बुराइयों के बारे में वह आख़ित के दिन उसकी जज़ा (पारितोषिक) या सज़ा का फैसला करेगा। इस प्रकार बंदा बुराई तो बुराई , भलाई में भी डरता रहता है कि इसमें कोई कमी तो नहीं रह गई कि आख़िरत के दिन अल्लाह के सामने उसे लज्जा उठाना पड़ेगी ।
रमजान के रोज़ों के द्वारा जब बंदा तक़्वे के गुणों से संवरने लगता है तो वह बुराइयों से बचने और घबराने लगता है । यह अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान का नतीजा होता है। वह सात पदों के अंदर भी बुराई करने से डरता है । अगर उससे कोई बुराई हो भी जाए तो तुरंत अल्लाह से माफी मांगता है।
आखिरत के दिन के दो चरण हैं । पहला चरण कब्र के जीवन से क़यामत के दिन पुनः उठाए जाने तक और दूसरा चरण कब्र से उठाए आने के बाद “मैदान हश्र” में इकट्ठा होने , हिसाब किताब ( कर्मों की गणना) होने, फिर न्यायस्वरूप जन्नत या नरक में जाने तक का है।
मृत्यु के बाद व्यक्ति जब सड़ गल कर या जल भुन कर राख हो जाएगा या उसे नदी , समुद्र की मछलियां खा जाएंगी तो क़यामत के दिन अल्लाह के आदेश से हज़रत इसराफ़ील सूर फुकेंगे( चिंघाड़ना बजाएंगे) तो उसकी आवाज़ सुनते ही सारे मृत इंसान जीवित हो जाएंगे । अपनी क़ब्रों से , ज़मीन , पानी , हवा हर जगह से सिमट कर “मैदाने में हश्र” में इकट्ठा हो जाएंगे । यहां उनकी अच्छाई बुराईयों की गणना आरंभ हो जाएगी । पवित्र कुरआन ने इन शब्दों में कयामत के आने और दोबारा उठाए जाने को बताया है कि “और सूर फूंका जाएगा तो वह सब क़बरों से निकलकर अपने परवरदिगार की तरफ दौड़ पड़ेंगे ( यासीन 51) , कहेंगे : हाय हमारी बदनसीबी हमको हमारी क़बरों से किस ने उठा दिया ? यही है वह वाकिया जिसका बेहद मेहरबान (खुदा) ने वादा फरमाया था, और अल्लाह के पैग़म्बरों ने सच ही कहा था (यासीन 52) , बस यह एक सख्त आवाज होगी, फिर एक ही दम सब के सब हमारे सामने हाजिर कर दिए जाएंगे ( यासीन 53)” , फिर उस दिन किसी शख्स के साथ जरा भी नाइंसाफी नहीं होगी और तुमको तुम्हारे किए का पूरा पूरा बदला दिया जाएगा (यासीन 54)।

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