Ramzan 2021: रमज़ान में सहरी और इफ्तार का होता है खास महत्व, रोज़े-नमाज़ के साथ मुसलमान ऐसे करते हैं इबादत

Ramzan 2021: रमज़ान इस्लाम धर्म के सबसे पाक और अहम महीनों में से एक है. मुस्लिम समुदाय के लोग साल भर रमज़ान के महीने का बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यताएं हैं कि रमज़ान के महीने में की गई इबादत का सवाब आम दिनों में की गई इबादतों के मुकाबले 70 गुनाह ज्यादा मिलता है. मुस्लिम समुदाय के लोग रमज़ान के पूरे महीने (29 या 30 दिन) तक रोजे रखते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं और कुरान की तिलावत करते हैं. इस बार रमजान का पाक महीना 14 अप्रैल 2021 से शुरू हो रहा है. यानी 13 अप्रैल की देर रात सुबह सूरज निकलने से पहले रमज़ान के महीने की पहली सहरी खाई गई और इसके बाद आज 14 अप्रैल से ही रोजे़- नमाज़ का सिलसिला शुरू हो गया है.

मुसलमानों के लिए रमज़ान के महीने का महत्व
मान्यताएं हैं कि इस महीने में अल्लाह अपने बंदों को बेशुमार रहमतों से नवाज़ता है और उनपर दोज़ख (जहान्नम) के दरवाजे बंद कर के जन्नत (स्वर्ग) के दरवाजे खोल देता है. माना जाता है कि रमज़ान के महीने में अल्लाह अपने बंदों की हर जायज़ दुआ को कुबूल करता है और उनको गुनाहों से बख्शीश (बरी) करता है. यही वजह है कि इस महीने में लोग इबादत करने के साथ-साथ अल्लाह से अपने गुनाहों की दिल से तौबा भी करते हैं. 

रमज़ान में कुरान पढ़ने की अहमियत
इस्लाम में रमज़ान के पाक महीने में रोज़ा रखने और नमाज़ पढ़ने के साथ कुरान पढ़ने की भी काफी फजीलत बताई गई है, क्योंकि रमज़ान के महीने में ही 21वें रोजे को पैगंबर हज़रत मोहम्मद साहब पर अल्लाह ने ‘कुरान शरीफ’ नाजिल किया था. यानी कुरान अस्तित्व में आया था. इसलिए इस महीने में कुरान पाक की ज्यादा से ज्यादा तिलावत की जाती है. 

क्या होती हैं तरावीह?
रमज़ान के महीने में हर दिन 5 वक्त की नमाज़ के अलावा रात के वक्त एक विशेष तरह की नमाज़ भी पढ़ी जाती है, जिसे तरावीह कहते हैं. रमज़ान के महीने का चांद दिखने के बाद से ही तरावीह (एक तरह की नमाज़) पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है. 

क्या होती है सहरी और इफ्तार?
रमज़ान के महीने में सहरी और इफ्तार करने की भी बेहद फजीलत है. सहरी सुबह सूरज निकलने से पहले खाए गए खाने को कहते हैं. सहरी खाकर ही रोजा रखा जाता है. कहा जाता है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब ने सहरी करने को सुन्नत बताया है. कहते हैं कि सहरी करने से बरकत होती है. इसलिए सहरी करने से सवाब मिलता है. शाम में सूरज ढलने पर जब रोजा खोलते हैं तो उसे इफ्तार कहते हैं. कहा जाता है कि इफ्तार के समय रोजेदार दिल से जो दुआ मागंते हैं, अल्लाह उनकी तमाम जायज दुआएं कुबूल करता है.

आंख, ज़ुबान और कान का भी होता है रोज़ा
रोजे रखने का मतलब सिर्फ खाने और पीने की चीजों से दूरी बनाना नहीं होता है. बल्कि रोजा आंख, जुबान और कान का भी होता है. यानी रोजा रखने के बाद रोजेदार ना गलत बात कर सकता है और ना झूठ बोल सकता है और ना ही किसी की बुराई कर सकता है. इसी तरह गलत चीजों को देखने और सुनने से भी रोजा टूट जाता है. इसलिए कहा जाता है कि रोजा रखने पर इंसान हर गलत काम और बुराइयों से पाक हो जाता है. 

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