शिक्षक दिवस विशेष: शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, इंसान का सर्वांगीण निर्माण है
नागपुर। 5 सितंबर को भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला मार्गदर्शक होता है। इसी संदर्भ में डॉ. एम. ए. रशीद, नागपुर ने ‘शिक्षा पर एक अध्ययन’ शीर्षक से शिक्षा और प्रशिक्षण के आदर्श स्वरूप पर विचार व्यक्त किए हैं।डॉ. रशीद के अनुसार, शिक्षा का अर्थ केवल अपने ज्ञान को दूसरों तक पहुंचाना नहीं है, बल्कि प्रशिक्षण के माध्यम से व्यक्ति को जीवन के उद्देश्य के लिए तैयार करना भी है। सही मार्गदर्शन, निरंतर देखरेख और अच्छे संस्कारों के जरिए व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण किया जाता है। सच्ची शिक्षा मनुष्य का बौद्धिक विकास करने के साथ उसके नैतिक, सामाजिक और मानवीय गुणों को भी विकसित करती है।लेख में कहा गया है कि इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार अल्लाह तआला ने सबसे पहले हजरत आदम अलैहिस्सलाम को ज्ञान प्रदान किया। उन्हें जीवन-यापन के तौर-तरीकों तथा हलाल और हराम का ज्ञान दिया गया। समय के साथ सांसारिक आवश्यकताओं के लिए मनुष्य की बुद्धि और अनुभव पर्याप्त होने लगे, लेकिन जीवन के उद्देश्य, आस्था और सही कर्म का मार्ग बताने के लिए केवल बुद्धि पर्याप्त नहीं थी। इसलिए नबियों को वही, किताब और शरीयत के माध्यम से मानवता की शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए भेजा गया।डॉ. रशीद ने कहा कि सभी नबी अपने-अपने दौर में महान शिक्षक और प्रशिक्षक रहे। जब दुनिया मानव सभ्यता के एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंची तो अंतिम पैगंबर हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पूरी मानवता की शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। उनके व्यक्तित्व में सुंदर नैतिकता, कोमल स्वभाव, स्पष्ट वाणी, बुद्धिमत्ता, सूझबूझ, करुणा और परोपकार जैसे गुणों का संगम था। इसी कारण उनका जीवन शिक्षकों के लिए आदर्श माना जाता है।उन्होंने कुरआन का हवाला देते हुए कहा कि पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के भेजे जाने के उद्देश्यों में लोगों को अल्लाह की आयतें सुनाना, उनका शुद्धिकरण करना तथा उन्हें किताब और हिकमत की शिक्षा देना शामिल है। लेख के अनुसार, यही शिक्षा और प्रशिक्षण की मूल भावना है।डॉ. रशीद ने हदीसों का उल्लेख करते हुए कहा कि पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने स्वयं अपने शिक्षक होने की भूमिका को स्पष्ट किया। उनके जीवन का प्रत्येक पहलू—बोलने, चलने, व्यवहार करने, लोगों से लेन-देन और समाज के साथ संबंध रखने का तरीका—शिक्षा का माध्यम बना।लेख में उनकी शिक्षण पद्धति का उल्लेख करते हुए बताया गया कि वे परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग तरीकों से लोगों को समझाते थे। कभी प्रश्नोत्तर के माध्यम से, कभी उदाहरण और घटनाओं के जरिए, कभी कहानी सुनाकर और कभी कोमलता के साथ समझाकर शिक्षा देते थे। आवश्यकता पड़ने पर चेतावनी भी देते थे। इस तरह उनकी शिक्षण पद्धति केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं थी, बल्कि व्यक्ति के व्यवहार और चरित्र में सकारात्मक बदलाव लाने पर केंद्रित थी।डॉ. रशीद के अनुसार, जिस समाज में अज्ञान, कठोरता और बर्बरता का प्रभाव था, पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षा और प्रशिक्षण ने वहां व्यापक सामाजिक और नैतिक परिवर्तन पैदा किया। उनके साथ रहने वाले सहाबा आगे चलकर समाज के मार्गदर्शक और सुधारक बने। लेख में इस परिवर्तन को मानव इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बताया गया है।उन्होंने कहा कि आज चौदह सदियां बीत जाने के बावजूद कुरआन और सुन्नत को मानने वाले करोड़ों लोगों के लिए पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षाएं मार्गदर्शन का स्रोत बनी हुई हैं।
आज के शिक्षकों की जिम्मेदारी
डॉ. रशीद ने कहा कि वर्तमान समय में स्कूल शिक्षक के साथ-साथ लेक्चरर और प्रोफेसर की जिम्मेदारी भी काफी बढ़ गई है। स्कूल का शिक्षक जहां बच्चे के चरित्र की नींव रखता है, वहीं कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षक उसके व्यक्तित्व और विचारों को दिशा देते हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों से केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि सोचने का तरीका, जीवन के प्रति दृष्टिकोण और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी सीखते हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षकों का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना और परीक्षा की तैयारी करवाना नहीं होना चाहिए। उन्हें विद्यार्थियों में जिज्ञासा, शोध की भावना, नैतिक साहस, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवता की सेवा का भाव पैदा करना चाहिए। ज्ञान के साथ हिकमत, कठोरता के साथ कोमलता और शिक्षा के साथ तरबियत को जोड़ना आज की आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए शिक्षकों को स्वयं भी निरंतर सीखने और बदलते समय के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। परिवार और समाज में अच्छे संस्कार विकसित करने तथा विद्यार्थियों को वैज्ञानिक सोच और मानवीय मूल्यों से जोड़ने में शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।डॉ. एम. ए. रशीद ने शिक्षक दिवस के अवसर पर देश के सभी शिक्षकों को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए कहा कि एक अच्छे शिक्षक का वास्तविक योगदान केवल किताबी ज्ञान देने में नहीं, बल्कि अच्छे इंसान और जिम्मेदार नागरिक तैयार करने में होता है।1








