पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सअव) परिचय सम्मेलन में सामाजिक सुधार, शिक्षा, समानता और सद्भाव पर वक्ताओं ने रखे विचार
नागपुर। जाफ़र नगर, टीचर्स कॉलोनी स्थित मर्कज़े इस्लामी हॉल में जमाअते इस्लामी हिंद, नागपुर वेस्ट की ओर से ‘पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सअव) परिचय सम्मेलन’ का आयोजन किया गया। सम्मेलन में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सअव) की शिक्षाओं, उनके सामाजिक सुधारों, इंसाफ, समानता, शिक्षा और भाईचारे के संदेश पर विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. अदनानुल हक़ द्वारा पवित्र क़ुरआन के पठन से हुआ। कार्यक्रम की प्रस्तावना अध्यक्ष डॉ. नुरुल अमीन ने रखी, जबकि संचालन कबीर ख़ान ने किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जमाअते इस्लामी हिंद महाराष्ट्र परिषद के सदस्य डॉ. अनवार सिद्दीकी ने कहा कि महापुरुषों की शिक्षाएं एक-दूसरे तक हस्तांतरित होनी चाहिए, ताकि समाज के सभी संप्रदाय और वर्ग उनके विचारों से परिचित हो सकें। उन्होंने कहा कि जब महापुरुषों की शिक्षाओं को समझा और अपनाया जाएगा, तभी समाज में प्रकाश फैलेगा, अंधकार दूर होगा और सद्भाव का वातावरण बनेगा।
डॉ. सिद्दीकी ने कहा कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सअव) ने इंसान को दूसरों के लिए उपयोगी बनने की शिक्षा दी। उन्होंने कहा कि आज समाज में शिक्षाओं से सीखने की प्रवृत्ति कम हुई है, जिसके कारण लोगों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं और समाज अपने-अपने दायरों में सिमटता जा रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे संतों और महापुरुषों ने भी दूसरे धर्मों की आध्यात्मिक शिक्षाओं को समझने और उनसे सीखने का प्रयास किया।
उन्होंने संत तुकाराम महाराज और महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा हज़रत मुहम्मद (सअव) की प्रशंसा में की गई काव्य रचनाओं का उल्लेख किया। साथ ही बताया कि राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज ने भी पैग़म्बर मुहम्मद (सअव) के जीवन पर लिखा है। सम्मेलन में युसुफ शेख ने महात्मा ज्योतिबा फुले की तथा मुहम्मद ज़फ़ीरुल हसन ने संत तुकाराम महाराज की रचनाएं प्रस्तुत कीं।
फ्रांस, रूस और मक्का की क्रांतियों पर तुलनात्मक अध्ययन
सम्मेलन में मराठा सेवा संघ के शहर अध्यक्ष पंकज निंबालकर ने ‘फ्रांस-रूस क्रांति और मक्का क्रांति का मुकम्मल मॉडल’ विषय पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि फ्रांस की 1789 की क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का नारा दिया, लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा गया। उनके अनुसार इसका परिणाम आगे चलकर नेपोलियन की तानाशाही के रूप में सामने आया।
उन्होंने रूस की 1917 की क्रांति का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां धर्म को नशा बताते हुए हिंसा के माध्यम से समानता स्थापित करने का प्रयास किया गया, लेकिन 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। उन्होंने कहा कि दोनों क्रांतियों का मुख्य जोर व्यवस्था बदलने पर था, जबकि मक्का की क्रांति ने इंसान के दिल और सोच को बदलने का काम किया।
पंकज निंबालकर ने मक्का विजय का उल्लेख करते हुए कहा कि जिन लोगों ने वर्षों तक पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सअव) और उनके साथियों को सताया था, वे जब उनके सामने आए तो उन्होंने बदले की भावना के बजाय उन्हें आज़ादी देने का संदेश दिया। उन्होंने इसे क्षमा और मानवीयता का उदाहरण बताया।
सामाजिक सुधारों पर भी हुई चर्चा
गुरुदेव युवा मंच के प्रवरू श्री ज्ञानेश्वर दुर्गादास रक्षक ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सअव) को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला समाज सुधारक बताया। उन्होंने कहा कि उस दौर में बेटियों को ज़िंदा दफ़न करने जैसी प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाई गई और महिलाओं को विरासत में अधिकार तथा सम्मान दिया गया।
उन्होंने हज़रत बिलाल का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें काबा की छत पर अज़ान देने का सम्मान दिया गया, जिसे उन्होंने सामाजिक ऊंच-नीच की दीवारों को तोड़ने का संदेश बताया। उन्होंने ‘इक़रा-पढ़ो’ के संदेश का उल्लेख करते हुए शिक्षा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पैग़म्बर मुहम्मद (सअव) की शिक्षाओं में सभी के लिए समान न्याय और इंसाफ पर जोर दिया गया।
इस अवसर पर नागपुर यूनियन के इंचार्ज श्री वसंत चांदेकर ने प्राचीन एवं वर्तमान अरब की सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अल्लाह और पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सअव) की प्रशंसा में अपनी स्वरचित रचनाएं भी प्रस्तुत कीं, जिन्हें उपस्थित लोगों ने सराहा।

सम्मेलन में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे। वक्ताओं ने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सअव) के जीवन और शिक्षाओं को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचाने तथा आपसी सद्भाव, भाईचारे और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने पर जोर दिया।
यह जानकारी जमाअते इस्लामी हिंद, नागपुर के मीडिया प्रभारी डॉ. एम. ए. रशीद ने दी।








