मुसलमानों को चाहिए कि वे इस्लाम के संपूर्ण आदेशों और आचार संहिता का पूरी तरह पालन करें (मुस्लिम समुदाय में इस्लाम की वास्तविक विशेषताएं अन्य समुदायों और धर्मालंबियों के साथ प्रखर रूप से दिखाई देना चाहिए )-डॉ एम ए रशीद नागपुर

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मुसलमान वह माना जाता है जो इस्लाम के संपूर्ण आदेशों और आचार संहिता का पूरी तरह से पालन करता हो , वह पवित्र कुरआन का मानने वाला, उसके अनुसार कर्म करने वाला होता है , वह ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आदर्श जीवन को अपने लिए मार्गदीप समझता है या जिस मार्ग पर आप सअ़व के उत्तराधिकारी (खुलफ़ा-ए-राशिदीन) और आपके वंशज चले, उसका अनुसरण करता है।
इस प्रकार मुस्लिम समुदाय में पवित्र कुरआन के अनुसार निम्नलिखित गुण और विशेषताएं प्रखर रूप से दिखाई देना चाहिए । पवित्र कुरआन 91:9-10 के अनुसार “जिसने अपनी इन्द्रियों को शुद्ध एवं स्वच्छ बनाया वह सफल हुआ और जिसने उनको अशुद्ध रखा, वह असफल रहा”।
इस से स्पष्ट होता है कि वही मुसलमान कहलाने के योग्य है जिसकी इन्द्रियों पर पाप का मैल न चढ़ा हो और न लगा हो।


ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आदर्श जीवन बेमिसाल गुणों से युक्त रहा। उससे पवित्र कुरआन कुरआन 62:2 की गवाही पेश करना बहुत उचित होगा कि “यह पैग़म्बर / दूत उन (अनपढ़ जाहिलों) को शुद्ध एवं स्वच्छ बनाते हैं और उनको ईश्वरीय पुस्तक और ज्ञान की बातें सिखाते हैं।
इस पंक्ति में दो शब्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है अर्थात शुद्ध और स्वच्छ बनाना और ज्ञान की बातें सिखाना। जो मनुष्य इन दोनों बातों को अपने जीवन में सम्मिलित कर लेता है, वही मुसलमान कहलाने का अधिकारी है।
पवित्र कुरआन 33:21 की। पंक्ति में भी मुसलमानों के लिए ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन को आदर्श बताया गया है कि
“तुम्हारे लिए ईश्वर के दूत के जीवन में एक उच्च आदर्श रखा गया है”। ईशदूत के सदाचरण और नैतिक पुष्पों के संग्रह का यदि संक्षेप में वर्णन किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि
आप कभी किसी को बुरा नहीं कहते थे। बुराई के बदले में बुराई न करते थे, बल्कि बुराई करनेवाले को क्षमा कर देते थे। किसी को अभिशाप नहीं देते थे। आपने कभी किसी दासी या दास या सेवक को अपने हाथ से सज़ा नहीं दी, किसी की नम्रतापूर्वक मांग को कभी अस्वीकार नहीं किया। आपकी ज़बान में बड़ी मिठास थी, कभी बुरी बात अपनी ज़बान से नहीं निकालते थे। शान्तिप्रिय थे, अति सत्यवादी और ईमानदार थे। बड़े ही नम्र स्वभाव के सुव्यवहारशील और मित्रों से प्रेम करनेवाले थे। किसी का अपमान नहीं करते थे, सदा सत्य का समर्थन करते थे। क्रोध को सह लेते थे, अपने व्यक्तिगत मामलों में कभी क्रोधित नहीं होते थे। जिन व्यक्तियों को बुरा समझते थे, उनसे भी सुशीलता एवं सुवचन का व्यवहार करते थे। ज़ोर से हँसना बुरा समझते थे, परन्तु सदा हंसमुख और खुश रहते थे आदि ये सभी गुण बिना किसी अतिश्योक्ति के वर्णित किए गए हैं, बल्कि इनका प्रमाण आपके जीवन की घटनाओं से भी मिलता है। पवित्र कुरआन के एक वाक्य से पता लगता है कि इस्लाम में नैतिकता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सूरा अ-ब-स में आता है कि एक बार ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम किसी विरोधी को समझा रहे थे कि इतने में एक मुसलमान आया, जो अन्धा था और वह ईशदूत को अपनी ओर आकर्षित करने लगा कि कुरआन का अमुक वाक्य किस प्रकार है, इसका अर्थ क्या है? आपको यह कुसमय का प्रश्न करना और वार्तालाप के बीच हस्तक्षेप बुरा मालूम हुआ और उस अन्धे पर आप नाराज़ हुए। उसी अवसर पर तुरन्त पवित्र क़ुरआन में यह पंक्ति 80:1-4 अवतरित हुई कि
“उसके माथे पर बल पड़ गए और ध्यान न दिया, इस कारण कि उसके पास अन्धा आया, और तुमको क्या पता कि शायद वह संवर जाता या उपदेश ग्रहण करता।”
यहां इस पंक्ति की व्याख्या की आवश्यकता नहीं । लेकिन ईश्वर ने इस्लाम में नैतिकता के स्तर को इतना ऊँचा स्थान दिया है कि किसी व्यक्ति पर अकारण त्योरी चढ़ाना भी ईश्वर को अच्छा नहीं लगा।
मुसलमान में कौन-से गुण होने चाहिए , इस्लाम के मानने वालों की वास्तविक विशेषताएं क्या होनी चाहिए इस पर पवित्र कुरआन की 3:134-135 इन दो पंक्तियों पर चिंतन मंथन करने की आवश्यकता है –
“ऐसे लोग जो अर्थदान करते हैं, अच्छी आर्थिक दशा में भी और कठिनाई में भी और गुस्से को पी जाने वाले और लोगों को क्षमा करने वाले होते हैं; ईश्वर ऐसे उपकार करने वाले को प्रिय रखता है। और जब वे कोई बुरा काम कर बैठते हैं या स्वयं अपने प्रति अन्याय कर बैठते हैं, तो वे ईश्वर का स्मरण करते हैं और अपने दोषों के लिए ईश्वर से क्षमा माँगते हैं।”
यह है ईश्वरीय आदेश है , यह वह इस्लाम की शिक्षा है जिसके आदेशानुसार चलकर इसकी शान को बढ़ाया जा सकता है।
इस प्रकार हर एक मुसलमान का कर्तव्य बनता है कि वह अपने जीवन को इन गुणों से परिपूर्ण करे और देखे कि वह कहाँ तक ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पद-चिह्नों पर चल रहा है। किस सीमा तक आप सअ़व के आदेशों का पालन कर रहा है। एक मुसलमान सच्चा मुसलमान तभी हो सकता है, जब वह पूरी तरह से इस्लाम के अनुसार चले, जिसका आदर्श ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने जीवन में स्थापित किया । यदि किसी मुसलमान का आचरण इसके विपरीत है तो वह समझे कि वह इस्लाम का अनुयायी नहीं। ईशदूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि तो उस धनी व्यक्तित्व के मालिक थे जिन पर मानवता और शिष्टता को पूर्ण किया गया। इस्लाम की पूर्णता का अर्थ ही यह है कि मानवता और नैतिकता को उसके उच्च स्तर तक पहुँचा दिया जाए।
इस के साथ ही इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि जब मुसलमान उपरोक्त आदर्शों का पालन करने लगते हैं तो वे उन सभी झूठे प्रचारों को खंडित भी करने लगते हैं जो बड़े ज़ोर-शोर से किए जा रहे होते हैं कि इस्लाम और उसके अनुयायी अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु नहीं हैं। सच तो यह है कि इस्लाम दया का धर्म है, इसका प्रेम और दया पूरी मानवता को ढांपे हुए रहती है। इस्लाम ने अपने अनुयायियों से दृढ़तापूर्वक आग्रह किया है कि वे अन्य समुदायों और धर्मालंबियों के साथ समानता, करुणा और सहिष्णुता का व्यवहार करें , उनके साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार, भेदभाव न करें । मुस्लिम समुदाय द्वारा उनके जीवन , संपत्ति, सम्मान , प्रतिष्ठा और मानवाधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए तथा उनके साथ भलाई और न्याय के साथ पेश आना चाहिए। न ही उनके प्रति मुस्लिम समुदाय में कोई शत्रुता या कड़वाहट भी नहीं होना चाहिए । मुस्लिम समुदाय को उन सभी के प्रति मददगार बनना चाहिए। दयालुता के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए । मुस्लिम समुदाय को दुनिया को दिखाना चाहिए कि इस्लामी नैतिकता, इस्लाम की शिक्षा का स्तर कितना ऊंचा है !