प्यारे नबी हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ख़ुत्बों का अंदाज़ ऐसा कि जो सुनता अपना दिल हार बैठता( मुस्लिम समुदाय के लिए जुमे के आदाब और आचार)- डॉ एम ए रशीद,नागपुर

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पैग़म्बर और रसूल इस्लाम धर्म के प्रचारक , शरीयत और मिल्लत के उपदेशक होते हैं । शरीयत सिखाने और धर्म का प्रबोधन करने का सबसे अच्छा साधन खुत्बा और सेमिनार होते हैं। इसलिए प्रत्येक पैग़म्बर और नबी का बेहतरीन ख़तीब , वक्ता होना उनकी आवश्यकताओं में सहायक उपकरणों की हैसियत रखते हैं । यही कारण है कि जब अल्लाह तआ़ला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अपनी रिसालत से ऊँचा उठा कर फ़िरऔन के पास भेजा तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उस समय क़ुरआन मजींद की सूरह ताहा की पंक्ति क्र 25 से 28 के अनुसार यह दुआ की कि
“ऐ मेरे रब, मेरा सीना खोल दे, मेरे लिए मेरा काम आसान कर और मेरी ज़ुबान की गिरह खोल दे ताकि वे लोग मेरी बाते समझ सकें”।


चूंकि पवित्र पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सभी रसूलों के प्रमुख और सभी पैग़ंबरों की मुहर हैं, इसलिए अल्लाह तआ़ला ने आपको ख़िताब , भाषण में ऐसी अद्वितीय पूर्णता प्रदान की थी कि आप पूरे अरब में सर्वश्रेष्ठ और चर्चित हैसियत का मुक़ाम रखते थे । आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को कम शब्दों में बहुत कुछ कहने में महारत रखने अर्थात जवामेउल कलीम का मोअ़जिज़ा दिया गया था । आपकी धन्य जिह्वा अर्थात ज़ुबान से निकलने वाले एक-एक शब्दों के अर्थ गागर में सागर के समान दिखाई देते थे। आप की वाणी का प्रभाव श्रोताओं के मन और हृदय जगत में एक महान क्रान्ति पैदा कर देता था।
पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जुमे और ईद के ख़ुत्बों के अलावा सैकड़ों अवसरों पर इतने प्रभावशाली संबोधन किए कि अरब लोग चकित हो गये । उसके प्रभाव से बड़े-बड़े पत्थर जैसे हृदय के लोग मोम की भाँति पिघल गये। पलक झपकते ही उनके दिलों की दुनिया बदल गई।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक इस्लाम धर्म के प्रचारक , एक सेना प्रमुख , एक विजेता, एक क़ौम अर्थात राष्ट्र सुधारक थे। इसलिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम विभिन्न स्थितियों और परिस्थितियों से परिचित थे । यही कारण है कि विभिन्न स्थितियों और परिस्थितियों पर आधारित आप के उपदेशों , ख़ुत्बों की शैली लोगों को प्रभावित कर देती थीं । रसूल हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अक्सर अपनी सभाओं में अपने रिश्तेदारों, दोस्तों से बातचीत करते थे। इस्लामिक स्टेट के प्रमुख के रूप में भी उन्होंने अनेक विदेशी प्रतिनिधिमंडलों को अनुमति दी जिसमें इस्लामी शिक्षाओं और अन्य मामलों पर गंभीर चर्चाएं की गई थीं। ऐसी दशाओं में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अनगिनत लोगों की सभाओं को संबोधित भी किया। जिसने एक बार भी आपकी बातचीत या संबोधन को सुन लिया होता वह हमेशा के लिए आपका गिरवीदा , मोहित , प्रेमी बन जाता था , वह अपना दिल हार बैठता था, और ऐसा क्यों ना होता! आप जब बात करते तो जैसे मुंह से फूल झड़ते, संबोधन करते तो बुद्धि और ज्ञान के मोती बिखरते थे । अल्लाह तआ़ला ने उन्हें संबोधन की ऐसी मलिका और बातचीत का ऐसा ढ़ंग अता किया था कि जो कोई एक बार भी नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बातें सुन लेता उसका दिल पसीज जाता।
एक बार एक क़बीला आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मिलने आया। बातचीत हुई तो क़बीला के सदस्य सहसा सदा बुलंद करने लगे कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिस भूमि पर आप पैदा हुए हम ने भी वहीं जन्म लिया है , जिन गलियों में आप पले-बढ़े वहीं हम भी बड़े हुए , जो आपकी ज़ुबान है वही ज़ुबान हमारी भी है लेकिन हमारी बोली में वह बात नहीं जो आपकी बात में है आख़िर इसका कारण क्या है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब में कहा कि “मेरा प्रशिक्षण ब्रह्मांड के निर्माता (ख़ालिके कायनात) ने स्वयं किया है और उसी ने मुझे बोलने का तरीका आप सिखाया है।”
इस प्रकार हज़रत अब्दुल्ला इब्न उमर रज़ि पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ख़ुत्बों और भाषणों के उत्साह का सबसे अच्छा चित्रण पेश करते हुए कहते हैं कि मैंने हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ख़ुत्बा देते हुए सुना , आप फ़रमा रहे थे कि अल्लाह सर्वशक्तिमान आकाश और ज़मीन को अपने हाथों में ले लेगा फिर फ़रमाएगा कि मैं सर्शशक्तिशाली हूं, मैं राजा हूं, कहां हैं शक्तिशाली लोग ? कहाँ हैं अहंकारी? यह कहते समय पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कभी मुट्ठी बंद लेते थे, कभी मुट्ठी खोल देते थे और कभी आपका जिस्मे अक़दस (जोश में) कभी दाईं ओर कभी बाईं ओर झुक झुक जाता यहां तक कि मैंने यह देखा कि मिंबर का निचला हिस्सा इतना हिल रहा था कि मैं (अपने दिल में) यह कहने लगा कि यह मिंबर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को लेकर गिर तो नहीं पड़ेगा , (इब्ने माजा)”।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जब भी मौक़ा मिला है मिंबर पर , ज़मीन पर, ऊँट की पीठ पर, खड़े होकर ख़ुत्बा दिया है। कभी-कभी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लंबे ख़ुत्बे भी दिए लेकिन आमतौर पर आपके ख़ुत्बे बहुत छोटे लेकिन बहुत विस्तृत होते थे। मस्जिदों में जब जुमा का ख़ुत्बा देते तो उनके हाथ मुबारक में “अ़स़ा” अर्थात छड़ी होती थी।
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ख़ुत्बों का प्रभाव सभी लोगों पर यह होता था कि कभी-कभी सबसे उत्तेजक अवसरों पर आपके कुछ वाक्य प्रेम और मुहब्बत की नदी बहा देते थे। हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि एक दिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इतना प्रभावशाली और मार्मिक ख़ुत्बा दिया कि मैंने ऐसा ख़ुत्बा पहले कभी नहीं सुना था। ख़ुत्बे के बीच में आप ने कहा कि “ऐ लोगों! मैं जो जानता हूं, अगर आप जान लेते तो हंसते कम और रोते ज़्यादा । ज़ुबान मुबारक से इस वाक्य का निकलना था कि श्रोताओं का यह हाल हो गया कि लोग कपड़ों में मुंह छिपा छिपा कर फूट फूट कर रोने लगे”।
जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भाषण देते तो हृदयहीन ، कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। कौन नहीं जानता कि ज़माद अज़दी किस इरादे से आया था कि आत्मसमर्पण करके लौटा। मक्का आया और दौड़ा दौड़ा पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास पहुंचा ऐ मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! सुना है तुम पागल हो। बताओ तुम्हें क्या परेशानी है? पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ख़ुत्बाए मसनूना पढ़ा अब्दुहू व रुसुलुहू तक पहुंचे तो दोबारा और तीन बार पढ़ने का अनुरोध किया। हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फिर सुनाया। उसका लोहे जैसा हृदय पानी और पत्थर जैसा मज़बूत इरादा पानी और पत्थर के जैसा दिल मोम हो गया।
अरबाज़ बिन सारिया रज़ि. फ़रमाते हैं कि एक दिन रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें नमाज़ पढ़ाई , नमाज़ के बाद हमारी तरफ़ चेहरा मुबारक किया और हमें सार्थक , बलीग़ उपदेश से संबंधित किया कि हमारी आंखों से आंसू जारी हो गये और हमारे दिल (अल्लाह के डर से) कांप गये ।
इससे पता चलता है कि पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम साहब का प्रत्येक उपदेश , ख़ुत्बा , संबोधन इतना प्रभावशाली होता था कि सुनने वालों की आँखों से आँसू बह निकलते थे। उनके संबोधन शुष्क ख़ुश्क न होकर वे कशिश , आकर्षण और रुचि से भरे होते थे । जो कोई आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का भाषण सुनता वह और अधिक सुनने की इच्छा रखता । श्रोता उत्साह और आनंद से अभिभूत हो जाते और बेइख़्तियार होकर पुकार उठते कि “ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! आप जिस तरह से उपदेश देते हैं हमें गुमान गुज़रता है कि यह आपका आख़िरी उपदेश है, इसलिए हमें और उपदेश सुनाईए।” फिर प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी श्रोताओं की दिलचस्पी और शौक़ को ध्यान में रखते हुए और भी नसीहत भरी बातें फ़रमाते ।
पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के समय को देखते हुए मुस्लिम समुदाय के लिए आज के हालात बड़े ही अफ़सोसनाक हैं। वे न हीं ख़ुत्बों के फ़ायदे समझ पा रहे हैं और न ही इमामों की तक़ारीर। जुमे में हाज़रीन के लिए इमाम बड़ी मेहनत से ख़ुत्बों के पहले दी जाने वाली तक़रीर को तय्यार करते हैं, जिसे सुनने वालों की संख्या शूरु में लगभग 10 – 15 लोगों की होती है , बड़ा दिल कर वे अपनी तक़रीर जारी रखते हैं। जैसे जैसे तक़रीर ख़त्म होने को आती है, मस्जिद में आने वालों की संख्या बढ़ती चली जाती है और उन्हें वह तक़रीर समझ में नहीं आती जो इससे पहले निकल चुकी होती है। आख़िर देर से आने वालों को क्यों कर वह समझ में आएगी ! देर से आने वालों के हाथ से अछूते पहलू जो निकल जाते हैं! इससे आगे इन इमामों की तक़ारीर पर कोई शख़्स न उन्हें शाबाशी देता दिखाई पड़ता है , न कोई उनकी प्रशंसा करना पसंद करते हैं और न ही कोई तक़ारीर के उस मौज़ू पर ख़तीब से बातचीत कर अपने इल्म में इज़ाफ़ा करना चाहते हैं। जो लोग अ़रबी, उर्दू ज़ुबानें नहीं जानते , अ़रबी ज़ुबान के ख़ुत्बों को नहीं समझ पाते इस बाबत जुमे की ख़ुत्बों से पहले की ये तक़ारीर मुस्लिम समुदाय के लिए बहुत अहमियत रखती हैं ।