उम्मते मुहम्मदिया के लिए अल्लाह ने जुमे के दिन को मख़सूस कर दिया हैजुमे में देर से आने वाला सवाब से महरूम रह कर फ़र्ज़ को ही अदा कर पाता हैमुस्लिम समुदाय के लिए जुमा के दिन के आदाब और आचार, डॉ एम ए रशीद, नागपुर

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उम्मते मुहम्मदिया के लिए अल्लाह ने जुमे के दिन को मख़सूस कर दिया है
जुमे में देर से आने वाला सवाब से महरूम रह कर फ़र्ज़ को ही अदा कर पाता है
मुस्लिम समुदाय के लिए जुमा के दिन के आदाब और आचार, डॉ एम ए रशीद, नागपुर

जुमे की नमाज़ से ग़फ़लत बरतने पर बहुत सी हदीसे हैं , उस संदर्भ से यह बात आती है कि जो लोग जुमा की नमाज़ से ग़ाफ़िल हो जाते हैं और सुस्ती बरलत़े हैं , अल्लाह तआ़ला उनके दिलों पर मोहर लगा देता है और उन्हें ग़ाफ़िलों में सामिल कर देता है। दूसरी तरफ़ जुमे से फ़ायदा उठाने वालों‌ के लिए अल्लाह तआ़ला ने जुमे की इबादत को हमारे लिये वरदान बनाया है। यह वरदान तब साबित होता है जब उसके बारे में पूरी तरह से उसकी हिदायतों की तकमील हो।वरदान के एक पहलू पर नज़र डालने से उसकी अहमियत का पता चलता है और कुछ बातें सामने आती हैं। हदीस में आता है कि अल्लाह तआला ने जब से दुनिया बनाई है सभी क़ौमों का इम्तिहान लिया है और उसी समय से उसने अपने इल्म के अंदर एक दिन को इबादत के लिए मुक़र्रर कर लिया है । अल्लाह तआ़ला ने यह बात किसी को नहीं बताई है । उसने क़ौमों का इम्तिहान लिया और कौमों से कहा गया कि तुम अपनी इबादत के लिए एक दिन निर्धारित कर लो कि इबादत उसी दिन ही करना है । इसमें कोई ओर काम नहीं करना सिर्फ़ मेरी ही इबादत करना। दुनिया की दूसरी कौमों ने इबादत के लिए दिन का चुनाव किया लेकिन सारी कौमें नाकाम हो गई और उम्मते मोहम्मदिया इसमें कामयाब हो गई ।


इबादत के बारे में जब यहूदियों से कहा गया कि तुम अपनी इबादत के लिए एक दिन मुक़र्रर करो तो उन्होंने सनिचर के दिन को चुना और कहा कि हम सनिवर के दिन इबादत करेंगे। अल्लाह तआ़ला के अपने इल्म में सनिचर का दिन नहीं था और उसने कहा तुम अपने इम्तिहान में असफल हो गए हो लेकिन अब इस दिन का अहतिमाम है कि इस दिन इबादत करना । ईसाईयों से कहा गया कि तुम भी एक दिन का चुनाव करो उन्होंने इतवार के दिन का चुनाव किया । अल्लाह तआ़ला ने कहा ठीक है लेकिन मेरे इल्म में वह नहीं था जिसका तुमने चुनाव किया है । लेकिन जब तुमने चुनाव कर ही लिया है तो उस दिन का अहतिमाम करो और उसे मेरी इबादत के साथ गुज़ारो।
यहूदियों की इबादत का दिन सनिचर इसलिए विशेष था कि उस दिन अल्लाह ने इस्राईलियों को फ़िरऔन के अत्याचार से बचाया था। ईसाइयों ने ख़ुद को यहूदियों से अलग करने के लिए रविवार को इबादत के लिए चुन लिया था । हालांकि इसकी आज्ञा पैग़ंबर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने नहीं दी थी, न ही इंजील में इसका उल्लेख है।
उम्मते मोहम्दिया को यह हुक्म दिया गया कि अपने लिए एक दिन का चुनाव करो तो रहमतुललिल आलमीन हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने लिए जुमे के दिन का चुनाव किया , अल्लाह तआ़ला ने फ़रमाया आप इम्तिहान में कामयाब हो गये। मेरे इल्म में जुमे का ही दिन था जिस को इबादत के लिए ख़ास किया था और आपने जुमे का दिन इंलिखाब किया । तो उम्मतें मुहम्मदिया जुमे के मामले में अल्लाह के इम्तिहान में कामयाब हो चुकी। जिसको अल्लाह तआला ने जब से दुनिया बनाया उसी वक़्त से इबादत के लिए जुमे को ख़ास किया था और इस दिन को उम्मते मुहम्मदिया ने मुंतख़ब कर लिया।
अब यह दिन है हम मुस्लिम समुदाय के लिए । अल्लाह तआला ने इस दिन को इबादत के लिखे इसे मख़सूस किया है। इस मख़सूस दिन पर हमारी हालत क्या है! जुमे की इबादत को छोड़कर हमारे दुनिया के काम इसी जुमे के दिन ही होते हैं। जुमे की नमाज़ में शरीक होने के लिए हालत यह है कि खुत्बा शुरू होता है तो काफ़ी ज़्यादा लोग खुत्बा शुरू होने के बाद आते हैं। जुमा में जल्दी आने के फ़ायदों पर अगर ध्यान दिया जाए तो हदीस से मालूम होता है कि कोई आदमी अगर जुमा का ख़ुत्बा शुरु हो जाए तो उसके बाद जुमे की नमाज़ में आए तो उसको जुमा का सवाब नहीं मिलता । जुमे की फ़ज़ीलत नहीं मिलती। एक ज़िम्मेदारी जो फ़र्ज़ का दर्जा रखती है वह ही अदा होती है। यह कितने ही ज़्यादा अफ़सोस की बात है कि एक आदमी जो जुमे के दिन मस्जिद में आया उस दिन वह सवाब से महरूम रहा, उसने सवाब को छोड़ कर सिर्फ़ फ़र्ज़ को को ही अदा कर सका , वह कितना बड़ा बदनसीब है, ऐसा इसलिए कि जब जुमे के दिन जुमा का वक़्त शुरू होता है जबकि अज़ान हो या न हो तो फ़रिश्ते मस्जिद के दरवाज़े पर रजिस्टर लेकर खड़े हो जाते हैं । पहले जो आया वे उसका नाम पहले लिख लेते हैं और फिर उनके ज़रिए नामों के लिखने का सिलसिला शुरू हो जाता है । पहले आने वाले को ऊंट की क़ुरबानी का सवाब मिलता है और बाद में आने वाले को यह सवाब घटते घटते कम सवाब में बदलता चला जाता है यहां तक कि ख़ुत्बा शुरू होने से पहले-पहले जितने लोग मस्जिद में आ गए होते हैं उनके नाम ये फ़रिश्ते उस रजिस्टर में लिख लेते हैं । इन लोगों को जुमा का सवाब मिल गया होता है। जैसे ही जुमा का ख़ुत्बा शुरू होता है फ़रिश्ते अपना रजिस्टर बंद कर जुमा का ख़ुत्बा सुनने के लिए बैठ जाते हैं। जो देर से आए रजिस्टर में उनकी हाज़री ही नहीं लग पाती है, फिर उन्हें सवाब का मिलना नामुमकिन हो जाता है। ऐसे लोग बहुत ज़्यादा बदनसीब होते हैं , इसलिए जुमा का सुबह से ही तैयारी करना चाहिए ।