शाबानुल मुअज़्जम,रमज़ानुल मुबारक की दस्तक का महिना(मुस्लिम समुदाय के लिए यह रमज़ानुल मुबारक की तैयारी का महीना है)- इस माह में बहुदेववादी या द्वेष रखने वाले को छोड़कर सभी प्राणियों को माफ़ कर दिया जाता है- डॉ एम ए रशीद,नागपुर

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रमज़ानुल मुबारक की दस्तक उन तमाम मुस्लिम समुदाय के लिए है जो शाबानुल मुअज़्जम में अपना तन मन रमज़ानुल मुबारक में लगाना चाहते हैं।रमज़ानुल मुबारक को आरंभ होने में कुछ ही दिन शेष बचे हैं। यह गतिशील महिना शाबानुल मुअज़्जम ईमान को मज़बूत करने, क्षमा मांगने और रमज़ानुल मुबारक के पवित्र महीने की तैयारी का महीना कहलाता है। शाबानुल मुअज़्जम, रमज़ान शुरू होने से पहले क़ुरआन के साथ जुड़ने और उसके साथ अपनी सहभागिता बढ़ाने का महिना है। इसकी शुरुआत अल्लाह की रहमतों के साथ होती है। शाबानुल मुअज़्जम, रज्जबुल मुरज्जब और रमज़ानुल मुबारक के बीच का महिना है। शाबानुल मुअज़्जम हिजरी कैलेंडर का आठवां महीना है।


शाबान तशा’उब से बना है, जिसका अर्थ है फैलना और आम हो जाना के हैं । पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आने से पहले अरब लोग लूटपाट के लिए रज्जबुल मुरज्जब के पवित्र महीने के बाद तितर-बितर हो जाते थे, इसलिए इसे शाबान कहा जाता है। कुछ विद्वानों ने शाबान का मतलब यह भी बताया है कि इसका संबंध एक विभाग से है जिसका अर्थ है भाग या हिस्से से है । इस महीने में अल्लाह की रहमत और कृपा के विशेष विभाग काम करना आरंभ कर देते हैं। इसीलिए इसे शाबान कहा जाता है।
हिजरत के दो साल बाद 15 शाबानुल मुअज़्जम को नमाज़ के लिए क़िबला का आदेश प्रकट हुआ था कि मस्जिदे अक्सा से क़िबला को मस्जिदे हरम (मक्का ए मुकर्रमा ) में बदल दिया गया था।
रज्जबुल मुरज्जब की विदाई और रमज़ानुल मुबारक के आगमन को इस महीने में महसूस किया जा सकता है।


यह हमें अपने कार्यों का लेखा-जोखा रखने और इबादत पर ध्यान केंद्रित करने की याद दिलाता है। अगर हम इस माह में रमज़ानुल मुबारक से पहले कुछ इस तरह की तैयारी और इंतजाम लें तो हम सब का रमज़ानुल मुबारक बहुत बेहतरीन तरीके से गुज़रेगा। रमज़ानुल मुबारक से पहले बचे कुछ दिनों में अपने खान पान के वक्त को सहरी इफ़्तार के आस पास कर लेना चाहिए। बीच में खाने से बचना चाहिए। रमज़ानुल मुबारक के पहले दिन से ही अचानक ‘रोज़ा’ रखने की बजाय शरीर को लंबे समय के अंतराल और भूख-प्यास को सहन करने की आदत बनाना चाहिए। मतलब खान-पान के समय को धीरे-धीरे बदलना ज़रूरी है । नफ़िल रोजों को रखने का प्रबंध इस माह में ज़रूर करना चाहिए। इससे रमज़ानुल मुबारक में शरीर को रोज़ा रखने की बेहतरीन आदत हो जाएगी और इन गतिविधियों से रमज़ानुल मुबारक तक शरीर नए शेड्यूल का आदी हो जाएगा । इसके लिए ज़रूरी है कि सुबह जल्दी नाश्ता कर लिया जाए। हम अपने नाश्ते का समय जितना जल्दी हो सके कर लें। इससे हमें सहरी में बहुत फ़ायदा मिलेगा और रमज़ान तक पहुंचने पर हमारे लिए सहरी करना आसान हो जाएगा । फिर यह समस्या नहीं होगी कि दिल खाने या पीने के मूड में नहीं था।
इसी तरह कॉफ़ी , चाय पानी के शौकीन भी चाहिए कि वे इन्हें कम करने की योजना बना कर उस पर अमल शुरू कर दें ।
शाबान को नेक महीनों में से एक माना जाता है। प्रामाणिक परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं के संदर्भ में इस महीने की बड़ी फ़ज़ीलत और महत्व सामने आए हैं । हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस महीने में विशेष रूप से बरकत के लिए दुआ की है। मुस्लिम समुदाय यानी अपनी उम्मत के बीच रूहानियत (आध्यात्मिकता) को बढ़ाने के लिए जहां उन्होंने अनिवार्य रोज़े के बारे में शिक्षा दी वहीं उन्हें ख़ासकर इसी शाबान के महीने में नफ़ली रोज़े रखने के लिए प्रोत्साहित भी किया ।
हज़रत आयशा रज़ि से रिवायत है कि मैंने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को किसी महीने में शाबानुल मुअज़्जम से ज़्यादा रोज़ा रखते नहीं देखा। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कुछ दिनों को छोड़कर लगभग शाबानुल मुअज़्जम के तक़रीबन रोज़ा रखा करते थे; बल्कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पूरे शाबानुल मुअज़्जम के रोज़ा रखा करते थे (तिर्मिज़ी: हदीस का संग्रह 736)।
उम्मुल मोमिनीन उम्मे सलमा रज़ि कहती है कि मैंने अल्लाह के दूत हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शाबान और रमज़ान के अलावा लगातार दो महीनों तक रोज़े रखते नहीं देखा। (नसाई, इब्न माजा)।
कुछ अन्य बुखारी, मुस्लिम हदीसों में शाबानुल मुअज़्जम के आख़िरी दिनों में रोज़ा रखने से भी मना किया गया है, ताकि रमज़ान के दौरान रोज़ा रखने में कोई कठिनाई न हो और रमज़ान की विशिष्टता उजागर होकर सामने आए ।
पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि यह एक ऐसा महिना है जो रज्जब और रमज़ान के बीच में (आता ) है और लोग इसकी उपेक्षा करते हैं, हालांकि इस महीने में (पूरे वर्ष के) कर्म अल्लाह सर्वशक्तिमान के पास ले जाये जाते हैं। मैं चाहता हूं कि मेरे कर्म रोज़ेदार होने की स्थिति में उठाए जाएं (इमाम नसाई और अहमद)।
अबू मूसा रज़ि से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि निसंदेह अल्लाह महान शाबान की आधी रात में अपनी नज़रे करम फ़रमाता है और अपने सभी प्राणियों को माफ़ कर देता है, बहुदेववादी या द्वेष रखने वाले को छोड़कर (सुनन इब्ने माजा)
शाबानुल मुअज़्जम, रमज़ानुल मुबारक के पवित्र महीने की तैयारी का महीना है। पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने विशिष्ट समय के संकेत दिए हैं जब हमारे कर्म अल्लाह की ओर उठाएं जाते हैं ।
शाबानुल मुअज़्जम उन समयों में से एक है जो हमें अपने कार्यों का जायज़ा लेने और अपनी इबादतों पर ध्यान केंद्रित करने की याद दिलाता है। अल्लाह के रसूल हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम शाबान के महीने में अपने आदर्श साथियों को इकट्ठा करते थे और उपदेश दिया करते थे , जिसमें उन्हें रमज़ान की फजीलत और समस्याओं का निराकरण बताते , रमज़ान की महानता और महत्व को देखते हुए इसकी तैयारी पर उनका ध्यान आकर्षित कराते । इसलिए हमें शअ़्बानुल मुअ़ज़्ज़म के इस माह में अधिक से अधिक लाभ मिलना चाहिए। तहज्जुद की नमाज़ अल्लाह से निकटता हासिल करने का एक महत्वपूर्ण साधन है, इसलिए शअ़्बानुल मुअ़ज़्ज़म की रातें अतिरिक्त नमाज़ों के लिए समर्पित करना चाहिए। क़ुरआन की तिलावत, पाठ और उसपर चिंतन मनन करने की आदत बनाना चाहिए।