इस्लाम के आधार स्तम्भ (मौलिक कर्म ) #मुसलमानों के अंदर आध्यात्मिक संबंध बनाने , दैनिक जीवन में मार्गदर्शन पाने, आत्मा को शुद्ध करने और वैश्विक मुस्लिम समुदाय के भीतर एकता को बढ़ावा देते हैं #-मुस्लिम समुदाय के लिए आचार और आदाब–डॉ एम ए रशीद, नागपुर

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इस्लाम की धारणाओं के बाद व्यावहारिक भागों में वे कर्म , अमल जिन को इस्लाम करने का आदेश देता है वह एक बड़ा विस्तृत विषय है और इसके लिए जो बहस अपेक्षित है उसके पूरे फैलाव के सामने हज़ार पृष्ठ भी कोई हैसियत नहीं रखते, किन्तु जहां तक इस्लाम के सामान्य परिचय का संबंध है उसके लिए महत्त्वपूर्ण और स्पष्ट शरीअत के आदेशों का अवलोकन कर लिया जाना चाहिए। इस्लाम के ये महत्वपूर्ण और स्पष्ट आदेश मौलिक रूप से दो प्रकार के हैं उनमें एक वे जिनका महत्व अधिक बुनियादी किस्म का है और जिनका स्थान इस्लामी शिक्षाओं के अन्दर धारणाओं के ठीक बाद ही आता है। दूसरे वे जिनकी हैसियत इस दर्जे की नहीं है और जिनका स्थान बाद में आता है। स्वभावतः पहले उन्हीं आदेशों का अवलोकन किया जाना चाहिए जिनका महत्त्व अधिक और बुनियादी क़िस्म का है।


इन कर्मों के संबंध में नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसी चीज़ों की ओर स्वयं संकेत कर दिया है। आप (सल्ल.) का सुप्रसिद्ध कथन है कि “इस्लाम का निर्माण पांच चीज़ों पर हुआ है, इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है, और यह कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह के रसूल हैं, सॅम / नमाज़ का आयोजन करना, ज़कात देना, हज करना और रमजान के रोजे रखना।” (हदीस : बुखारी, भाग-1, किताबुल-ईमान)
एक और रिवायत से मालूम होता है कि आप सअ़व ने “इस्लाम का निर्माण पांच चीज़ों पर हुआ है” के बाद यह फ़रमाया – इस्लाम का निर्माण पांच आधार स्तम्भों पर हुआ है।”
भवन के आधार स्तम्भ न हों तो तो वह पूर्ण भवन नहीं होता। आधार स्तम्भ भवन से अलग कोई चीज़ नहीं होते, बल्कि दूसरी चीज़ों की तरह वे भी पूरे भवन के भाग होते हैं । इमारत के दूसरे हिस्सों और उन आधार स्तम्भों के बीच एक बड़ा अंतर होता है।अर्थात, दूसरे हिस्सों की तुलना में उन्हें एक विशिष्टता प्राप्त होती है और वह यह कि ये भी यद्यपि स्वयं पूर्ण भवन होने की बजाय उस का एक भाग ही होते हैं, मगर ऐसे भाग होते हैं जिनपर शेष भागों का अस्तित्व और उनकी स्थिरता निर्भर होती है। इसलिए तौहीद व रिसालत की गवाही, सॅम / नमाज़, ज़कात, हज और रोज़े के ‘इस्लाम के आधार स्तम्भ’ होने का अर्थ यह है कि जिस प्रकार किसी भवन के स्तम्भों को बना लेने से पूर्व आप उस पर कोई दूसरा निर्माण नहीं कर सकते, ठीक उसी प्रकार इन पांचों को पूरा किए बगैर इस्लाम धर्म की अन्य शिक्षाओं पर अमल , कर्म नहीं किया जा सकता और अगर कोई अमल किया जाएगा तो वह वास्तव में अमल का केवल नाम होगा, वस्तुत: अमल न होगा।
अगर ये पांचों स्तम्भ ठीक तौर से स्थापित हो जाते हैं तो शेष कामों का पूर्ण हो पाना बिल्कुल संभावित है, बल्कि लगभग अनिवार्य और ज़रूरी होगा। यही कारण है कि एक दूसरी हदीस में केवल इन्हीं चीज़ों को ‘इस्लाम’ कहा गया है। फ़रमाया : “इस्लाम यह है कि तुम गवाही दो कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं और मोहम्मद (सल्ल. ) अल्लाह के रसूल हैं, सलात/नमाज़ क़ायम करो, ज़कात दो, सॉम / रमज़ान के रोज़े रखो और काबा तक की यात्रा की सामर्थ्य रखने की स्थिति में उसका हज करो।” (हदीस : मुस्लिम- भाग-1, किताबुल-ईमान)
यद्यपि पिछली हदीस में इन्हें ‘इस्लाम’ नहीं बल्कि ‘इस्लाम के स्तम्भ’ कहा गया था। इसलिए अब इन्हें ‘इस्लाम’ कहे जाने का स्पष्टतः अर्थ यह होगा कि ये पांचों कर्म धर्म के ऐसे मौलिक कर्म है कि इनका अस्तित्व में आ जाना वास्तव में पूरे इस्लाम के अस्तित्व में आ सकने की ज़मानत है। इस प्रकार वे इस्लाम का केवल एक अंश होते हुए भी मानो पूरा इस्लाम है।
इस्लाम के पांच स्तंभ बुनियादी इस्लामी सिद्धांत हैं जो इस्लामी अभ्यास की रीढ़ के रूप में कार्य करते हैं। ये स्तंभ प्रत्येक धर्मपरायण मुसलमान के लिए आवश्यक कर्तव्य हैं। ये बुनियादी ढांचा बनाते हैं जिसके माध्यम से व्यक्ति अल्लाह , ईश्वर के प्रति अपना विश्वास, भक्ति और समर्पण व्यक्त करते हैं। इन इस्लामी स्तंभों को कायम रखकर मुसलमान आध्यात्मिक संबंध बनाते हैं, अपने दैनिक जीवन में मार्गदर्शन पाते हैं, अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं और वैश्विक मुस्लिम समुदाय के भीतर एकता को बढ़ावा देते हैं। इस्लाम के ये पांचों स्तंभ पारदर्शी हैं, कोई भी धर्मनिष्ठ मुसलमान उन्हें आसानी से समझ सकता है और उनका अभ्यास कर सकता है।
ये कर्म (अमल) इस्लाम के लाक्षणिक अर्थ में पूरा इस्लाम कहलाते हैं जो कि इनके विवरण पर गौर करने से स्वयं स्पष्ट हो जाएगा। इन कर्तव्यों (कर्मों) के नियत हो जाने के बाद जिनको शरीअत के सारे कर्मों में प्राथमिकता और सबसे अधिक मौलिक महत्व प्राप्त है, उनके सम्बन्ध में क़ुरआन और हदीस के विस्तृत वक्तव्य इन शा अल्लाह क्रमशः प्रस्तुत किए जाएंगे।