इस्लाम चाहता है कि जन सेवा में सत्यनिष्ठा और प्रेम भाव हो (ऐसी जन सेवा से सम्मान मिलता है और आदर की भावना उत्पन्न हो जाती है)- डॉ एम ए रशीद, नागपुर

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इस्लाम चाहता है कि जन सेवा में सत्यनिष्ठा और प्रेम भाव हो (ऐसी जन सेवा से सम्मान मिलता है और आदर की भावना उत्पन्न हो जाती है)
———- डॉ एम ए रशीद , नागपुर

जन सेवा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। मुस्लिम समुदाय इस कार्य क्षेत्र में बढ़ चढ़ कर भाग लेता है । लेकिन ऐसा समझा जाता है कि मुस्लिम समुदाय द्वारा की जाने वाली इस शजन सेवा के क्षेत्र में केवल मुसलमान ही आते हैं, जो सही नहीं है। सेवा का कार्य समस्त मानवता को समाहित करता है। यह सेवा अलग अलग रुपों में दिखाई देती है। जैसे कि आज हमारे समाज में बहुत से देशवासी उत्पीड़न का शिकार हैं और गरीबी का जीवन जीने पर विवश हैं । ऐसे समय उनके पक्ष में आवाज़ उठाना भी एक बहुमूल्य सेवा के क्षेत्र में आएगा । यह सेवा सामूहिक न्याय और निष्पक्षता पर आधारित होती है। जन सेवा के संबंध में
पवित्र हदीस में रमज़ानुल मुबारक के महीने को शहरुल मवासत कहा गया है, जिसका अर्थ है कि रोज़ा भूख-प्यास का वार्षिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि लोगों की सेवा करने का एक वार्षिक प्रशिक्षण है । रमज़ानुल मुबारक का यह महिना संपन्न रोज़ेदारों को गरीबों और ज़रूरतमंदों, विकलांगों और वंचितों की सहायता और परोपकार जैसे गुणों के लिए उभारता है।
लोगों की सेवा करने की यह जिम्मेदारी निश्चित रूप से एक भारी जिम्मेदारी है, क्योंकि यहां सेवक बिना किसी निजी स्वार्थ के दूसरों के कल्याण और खुशी को अपना लक्ष्य बनाता है। अतः उसके लिए अल्लाह का इनाम मूल्यवान है।
एक हदीस में अल्लाह के दूत हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि “मैं और अनाथ का पालन पोषण करने वाला वह अनाथ चाहे उसका रिश्तेदार हो या न हो स्वर्ग में इस प्रकार करीब होंगे जैसे मेरी ये दो उंगलियां।” अल्लाह के दूत हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों को नियमित रूप से इस का आदेश दिया करते थे। आपका एक कथन प्रस्तुत है कि “बीमारों की “इयादत ” सेवा करो, भूखे को खाना खिलाओ और कैदी की रिहाई की व्यवस्था करो।” एक अन्य स्थान पर उन्होंने कहा कि “अल्लाह, महान बंदे की सहायता में उस समय तक लगा रहता है जब तक बंदा अपने भाई की मदद करता रहता है।”
यह मुस्लिम समुदाय के लिए अनुकरणीय आदर्श है जिसे रमज़ान को मवासात का शहर कहकर मुसलमानों के बीच उन आदर्शों को विकसित करने की और अधिक आवश्यकता है। इस हदीस से मालूम होता है कि मानव की सेवा जैसी बड़ी ज़िम्मेदारी निभाने वाले लोग अल्लाह को सबसे महबूब और प्यारे होते हैं। पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा कि “सारी सृष्टि अल्लाह का परिवार है, और अल्लाह का सबसे प्रिय बंदा वह है जो अल्लाह के परिवार को लाभ पहुंचाता है”। उस समय अरब की एक जाति के लोग ग़रीबी की स्थिति में पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए तो आपका सअ़व का चेहरा मुबारक पीला पड़ गया। वह घर आए और हज़रत बिलाल को अज़ान देने का आदेश दिया। नमाज़ के बाद आप सअ़व ने पवित्र क़ुरआन की कुछ पंक्तियों (छंद) का पठन की और कहा – लोगों अल्लाह की राह में दान देना चाहिए। दीनार , दरहम , कपड़ा और खजूर जो कुछ हो अल्लाह की राह में पेश करें । एक अंसारी एक थैला लेकर आये, उसके बाद लोगों ने इतना दिया कि कपड़े और अनाज का ढेर लग गया । यह देखकर आप सअ़व का चेहरा मुबारक खुशी से चमक उठा। उस समय का यह एक छोटा सा प्रतिबिंब है ।
आज के भौतिकवादी युग में जब कि गरीबी, अभाव, क्रूरता और नफ़रत अपने चरम पर है, अगर मुस्लिम समुदाय लोगों की सेवा पर भरपूर ध्यान दे तो यह निश्चित रूप से इस्लाम और मानवता के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। यदि जन सेवा में किसी प्रकार से कमी हो तो इस कार्य के लिए दूसरों से सेवाएं भी ली भी जा सकती हैं । जहां सेवा ली जाती हैं, वहां प्राय: ज़ोर-ज़बरदस्ती का पहलू सम्मिलित हो जाता है, और अत्याचार और अन्याय होने लगता है, शोषण होता है, अधिकार छीने जाते हैं, भावनाओं को आघात पहुंचाया जाता है और मानव की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाती है। यह क्रम जब लम्बा होता है तो गुलामी की सीमाओं को छूने लगता है । इस्लाम हर प्रकार के अत्याचार और ज़ोर-ज़बरदस्ती के विरुद्ध है और उसे मिटा देना चाहता है। उसके नज़दीक, इन्सान को इन्सान का गुलाम बना देना मानव-अधिकार का घोर हनन है ।
इस्लाम चाहता है कि यह जन सेवा सत्यनिष्ठा और प्रेमभाव के साथ हो और उससे घटिया स्वार्थ जुड़े हुए नहीं होने चाहिए। तब इस प्रकार सेवा करने वाले को बड़ा सम्मान मिलता है । उसके प्रति प्रेम और आदर की भावना उत्पन्न होती है । उसकी श्रेष्ठता को महसूस किया जा सकता है और वह लोगों के दिलों पर शासन करने लगता है। ठीक ही कहा गया है कि “जो सेवा करता है वह सेव्य बन जाता है।” जहां तक परलोक, आख़िरत का सम्बन्ध है तो जो सेवा सत्यनिष्ठा और ख़ुलूस के साथ की जाए उसके प्रतिदान (सवाब) और पारितोषिक का अनुमान कौन कर सकता है? वह असीम और अगणित होगा । इस सीमित संसार में हम उसकी कल्पना बिल्कुल भी नहीं कर सकते ।