ग़फ़लत ने जुमे की पाबंदियों और ख़ुशख़बरी को नकारा याद आती हैं इसी वक्त सारी ज़िम्मेदारियां मुस्लिम समुदाय के लिए जुमा के दिन के आदाब और आचार-डॉ एम ए रशीद नागपुर

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पवित्र क़ुरआन की सूरह अहज़ाब की पंक्ति क्र. 45 से 47 में अल्लाह तआ़ला फ़रमाते हैं कि “ऐ नबी! हमने आपको साक्षी (अर्थात लोगों को अल्लाह का उपदेश पहुंचाने का साक्षी), शुभसूचक (अल्लाह की दया तथा स्वर्ग का, आज्ञाकारियों के लिये) और सचेतकर्ता (अल्लाह की यातना तथा नरक से, अवैज्ञाकारियों के लिये) बनाकर भेजा है। और अल्लाह की अनुमति से उसकी ओर बुलाने वाला बनाकर और प्रकाशमान प्रदीप बनाकर। ( इस पंक्ति में यह संकेत है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) दिव्य प्रदीप के समान पूरे मानव विश्व को सत्य के प्रकाश से जो एकेश्वरवाद तथा एक अल्लाह की इबादत /वंदना है प्रकाशित करने के लिये आये हैं। और यही आप की विशेषता है कि आप किसी जाति या देश अथवा वर्ण-वर्ग के लिये नहीं आये हैं। और अब प्रलय तक सत्य का प्रकाश आप ही के अनुसरण से प्राप्त हो सकता है)। ईमानवालों को शुभ सूचना (ख़ुशख़बरी) दे दो कि उनके लिए अल्लाह की ओर से बहुत बड़ा उदार अनुग्रह है ।
इन ख़ुशख़बरियों की घोषणाएं


नमाज़ और मुख़तलिफ़ इबादतों की पाबंदी के साथ की गई हैं। उन में किसी नेक काम करते चले जाने पर भी भले ही वह थोड़ा सा ही क्यों न हो उसकी भी ख़ुशख़बरी है । उदाहरण के तौर पर रास्ते से तकलीफ़ देने वाली चीज़ पत्थर, केले के छिलके जिनसे किसी इंसान और वाहन चालक को नुक्सान पहुंचने की आशंका है , उसे इस नियत से हटा देना कि उससे किसी को कोई तकलीफ़ से सकती है तो इस चीज़ को हटा देने पर भी अल्लाह सर्वशक्तिमान अज्रो व सवाब से नवाज़ता है । इसी तरह हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कई स्थानों पर इस तरह की नेकियां करने पर उनकी ख़ुशख़बरी सुनाई हैं।
इन ख़ुशख़बरियों में आज जुमे का दिन भी आता है जिसे सय्यदुल अय्याम, दिनों का सरदार के नाम से जाना जाता है । इसको बड़ी अहमियत और बड़ा मुकाम हासिल है। एक हदीस में आता है कि जब जुमे का दिन आता है तो इंसान और जिन्नात के अलावा तमाम मख़लूक़ के ऊपर लरज़ा यानी कि कंपकपी छा जाती है कि कहीं क़यामत का दिन क़ाइम न हो जाए । लेकिन इस लरज़ा यानी कि कंपकपी का नाम सुनकर इंसान पर उसका कोई प्रभाव पड़ता हुआ दिखाई नहीं देता। इससे स्पष्ट होता है कि इंसान इतना लापरवाह और ग़ैर ज़िम्मेदार हो गया है कि जुमे के दिन की जो अहमियत , मुक़ाम और मरतबा हासिल है यह सब जानते बूझते हुए जुमे को वह मुक़ाम और मरतबा नहीं दिया जाता जिसका उसे हक़ हासिल है । इबादतों के साथ इसकी इतनी ज़्यादा ख़ुशख़बरियां हैं कि उनसे उम्मत दूर होती जा रही है जबकि इन ख़ुशख़बरियों में हमारी निजात भी शामिल है ।
आख़िरकर इससे हम महरूम क्यों कर होते जा रहें हैं , इस बारे में हमें सोचने की बहुत ज़्यादा ज़रुरत है। इतनी कि हम बचपन से ही सुनते आ रहे हैं लेकिन हम अपने आप में किसी तरह का बदलाव और परिवर्तन लाने को तैयार नहीं! बार बार ख़तीबों के ज़रिए इसके सवाब और ख़ुशख़बरी के बारे में बताया जाता रहा है कि पहले आने पर एक जानवर की क़ुर्बानी का सवाब है और यह भी कि मस्जिद के दरवाज़े पर विराजमान फ़रिश्ते पहले आने वालों के नाम अपने रिकार्ड में दर्ज कर लेते हैं । लेकिन शायद ही हम अपना नाम उस रिकार्ड में दर्ज करवा पाते हैं! इसीलिए कि जुमे के बारे में हमारे कोई तैयारी नहीं होती और हम देर से मस्जिद पहुंते हैं। दुनियावी नाम नमूद के लिए अगर अपने घर, पिकनिक या सफ़र का कोई प्रोग्राम होता है तो हफ़्ते भर पहले से ही हम उसकी तैयारी में लग जाते हैं । यहां अफ़सोस का मुक़ाम है कि मस्जिद मे जुमे के लिए हमारे पास कोई तैयारी नहीं होती और न ही उसका कोई अहतिमाम होता है। ग़फ़लत भरी ज़िन्दगी के साथ जुमे का पूरा वक़्त बहुत भारी पड़ता है जो अज़ान से लेकर नमाज़ के शुरू होने तक बड़ी बैचेनी का होता है ! यह इतना भारी पड़ता है कि कहीं जल्दी न पहुंच जाऊं , अभी तो अज़ान ही हुई है, अभी ख़तीब साहब ब्यान कर रहे होंगे , फिर ख़ुत्बा होगा ! मुझे तो सिर्फ नमाज़ ही पढ़नी है ! ग़फ़लत और लापरवाही वाली ज़िंदगी दुनिया में मगन रहने और आख़िरत/ परलोक को भूल जाने का नाम है । ग़ाफ़िल और लापरवाह इंसान फ़ानी (नश्वर ) हो जाने वाली दुनिया और हमेशा रहने वाली आख़िरत (शाश्वत परलोक ) की बरबादी में लिप्त रहता है। इसके कारणों में सबसे बड़ा कारण अल्लाह की महान विशेषताओं और उसके अस्माए हुसना अर्थात अच्छे नामों की जानकारी न होना है। बहुत से लोग अपने “रब” को नहीं जानते। अगर वे “रब” को अच्छी तरह से पहचान लें तो वे कभी उससे ग़ाफ़िल नहीं हो सकते और कभी भी उसके आदेशों का इंकार नहीं करेंगे।
जुमे के लिए मस्जिद में यहां उनकी तरह आया जाता है जिन्हें हम महमाने खुसूसी कहते हैं। उसी तरह का प्रोग्राम रचा जाता है कि सिर्फ़ दो रकअत नमाज़ ही तो अदा करना है। अगर कोई ग़ाफ़िल जुमे के लिए जल्दी आ जाता है तो वह कभी घड़ी को , कभी ख़तीब को तो कभी इमाम को देखते रहता है कि वे वक्त के पाबंद हो जाएं ! वह चाहता है कि मुख्तसिंर ख़िताब और खुत्बा दिया जाए , मुख्तसिर नमाज़ पढाई जाए ! लेकिन हम अपने आपको उनका पाबंद नहीं करते कि मुझे भी वक़्त की पाबंदी के साथ मस्जिद में आना चाहिए । जबकि उल्टा जल्दी आने वाला ग़ाफ़िल यह चाहता है कि ख़तीब और इमाम मेरा पाबंद हो जाए ।
दूसरी तरफ़ आश्चर्य की बात यह भी है कि ग़ाफ़िलों को सारे काम इसी समय याद आते हैं , सारी ज़िम्मेदारियां भी इसी समय याद आती हैं। ग़फ़लत और इस तरह के भाव जुमे की पाबंदियों और ख़ुशख़बरी को नकार देते हैं ‌। ऐसे लोग हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई जुमे की ख़ुशख़बरियों और बाक़ी के अज्रो सवाब से महरूम भी हो जाते हैं।
जुमे के दिन की ऐसी ख़ुशख़बरी वाली घड़ी है कि अल्लाह तआला से जो मांगो वह अता फरमा देता है । इस बारे मे इतेफाक़े राय से यह कहा जाता है कि वह असर से लेकर मग़रिब तक की घड़ी है । यहां यह भी सोचने की बात है ऐसा कीमती वक्त में हमारा वक़्त कहां खर्च होता है जिसकी वजह से हम इस वक्त से भी महरूम रह जाते हैं। हमें अपने आप को बदलना होगा, पवित्र क़ुरआन की इस “सूरह जुमा” का पाबंद होना पड़ेगा, तभी हमारी निजात मुमकिन है।