अल्लाह, ईश्वर पर ईमान लाना जो हमेशा से है, हमेशा रहेगा, उसे किसी ने पैदा नहीं किया है, बल्कि वह आप से आप मौजूद है” # (मुस्लिम समुदाय के लिए ईमान से जुड़ी मुख्य बातें)- डॉ एम ए रशीद, नागपुर

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ईश्वर अल्लाह के मौलिक और महत्त्वपूर्ण गुण ये हैं कि वह अनादि और शाश्वत और स्वयंभू है।वह स्रष्टा (ख़ालिक़) है,वह रब है,वह स्वामी और शासक है , वह सर्वज्ञ (अ़लीम) है, वह तत्त्वदर्शी (हकीम) है, वह शक्तिशाली अर्थात अ़ज़ीज़ है, वह न्यायकारी (आदिल) है,वह मुजाज़ी अर्थात बदला देनेवाला है , वह आराध्य यानी माबूद है, वह अकेला है
मुस्लिम समुदाय के लिए ईमान से जुड़ी मुख्य बातों में प्रमुख्य यह कि उसे मालूम होना चाहिए कि अल्लाह पर ईमान लाने का अर्थ क्या होता है। उस में पहला यह कि हर किसी को उसके अस्तित्व को स्वीकार किया जाना चाहिए। फिर उसे उन समस्त विशेषताओं और गुणों से जिनकी व्याख्या क़ुरआन और अल्लाह के रसूल पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने की है उनको पूरी तरह परिभूषित माना जाए। उन अधिकारों को उसी के लिए विशिष्ट माना जाना चाहिए जो उन विशेषताओ की अनिवार्य अपेक्षाओं की हैसियत रखते हैं तथा उन अधिकारों को भी केवल उसी का अधिकार माना जाना चाहिए जो उन गुण से स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए हैं और जिनको माने बिना उन गुणों का मानना निरर्थक हो जाता है।
इनमें से पहली चीज़ की बात है, वह तो स्वयं ही स्पष्ट है। इसलिए उसके बारे में व्याख्या और विस्तार का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह सोचने समझने की बात है कि यदि कोई व्यक्ति अल्लाह तआ़ला के अस्तित्व ही को नहीं मानता हो तो वह उस पर आस्था ही क्या रखेगा ।


कुछ ऐसी चीज़ें जो स्पष्ट नहीं हैं उनके विषय में थोड़े विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता है । उसमें यह बताना ज़रूरी है कि अल्लाह तआ़ला के गुण क्या-क्या हैं ? और उन गुणों की अपेक्षाएं क्या हैं? लेकिन चूंकि अल्लाह के सभी गुण समान हैसियत नहीं रखते, बल्कि उनमें प्रधानता की हैसियत मात्र कुछ ही को प्राप्त है, शेष गुण वास्तव में उन्हीं मौलिक गुणों की अपेक्षाएं या शाखाएं हैं। यदि मौलिक गुणों को आवश्यक सीमा तक स्पष्ट कर दिया जाए तो शेष गुणों की व्याख्या की कोई विशेष आवश्यकता नहीं रह जाएगी और इससे यह बात समझ में आ जाएगी कि अल्लाह पर ईमान रखने के लिए उसे किस प्रकार के गुणों का स्वामी मानना चाहिए। यहां मात्र उन्हीं कुछ मौलिक गुणों का और उनकी आवश्यक अपेक्षाओं का उल्लेख किया जाता है। इस प्रकार अल्लाह तआ़ला ईश्वर , के मौलिक और महत्त्वपूर्ण गुण ये हैं कि (1) वह अनादि और शाश्वत और स्वयंभू है। इसका अर्थ यह है कि वह हमेशा से है, हमेशा रहेगा। उसे किसी ने पैदा नहीं किया है, बल्कि वह आप से आप मौजूद है।
(2) वह स्रष्टा (ख़ालिक़) है, अर्थात यह कि वह चीज़ों को पैदा करता है और अनास्तित्व से अस्तित्व में लाता है।
(3) वह रब है, अर्थात वह आजीविका देता और पालन-पोषण करता है।
(4) वह स्वामी और शासक है और सृष्टि-प्राणियों में एक-एक उसकी मिल्कियत और उसके वशीभूत है।
(5) वह सर्वज्ञ (अ़लीम) है, अर्थात वह हर बात, हर काम और प्रत्येक गतिविधियों को जानता है। क्या हुआ, क्या हो रहा है, क्या होगा यह सब उसके ज्ञान में है। कोई चीज़ उसके ज्ञान से बाहर नहीं है।
(6) वह तत्त्वदर्शी (हकीम) है, उसका कोई काम तत्त्वदर्शिता से रहित निरुद्देश्य और निष्फल नहीं होता, बल्कि प्रत्येक कार्य के पीछे उच्चतम
समझ, उच्चतम तत्त्वदर्शिता और उच्चतम उद्देश्यमयता काम कर रही होती है।
(7) वह शक्तिशाली अर्थात अ़ज़ीज़ है, वह प्रत्येक कर्म की शक्ति व सामर्थ्य रखता है। उसके किसी इरादे को व्यावहारिक रूप देने से बिल्कुल भी रोका नहीं जा सकता। उसका कोई निर्णय, फ़ैसला रद्द नहीं किया जा सकता, उसके किसी आदेश , हुक्म को चुनौती नहीं दी जा सकती।
(8) वह न्यायकारी (आदिल) है, उसका प्रत्येक कार्य न्याय अर्थात इंसाफ़ पर आधारित होता है। उसके नैसर्गिक आदेश भी पूरी तरह न्यायपूर्ण होते हैं और उसके वैधानिक आदेश भी, और उसी तरह उसके सारे निर्णय भी ठीक-ठीक न्यायानुकूल होते हैं।
(9) वह मुजाज़ी अर्थात बदला देनेवाला है । वह कर्मों का बदला देता है, बुरे कर्म का बुरा बदला और अच्छे कर्म का अच्छा बदला ।
(10) वह आराध्य यानी माबूद है। यह उसका हक़ है कि उस की ही अराधना और इबादत की जाए, सिर उसी के आगे झुकें और दुआएं और प्रार्थनाएं उसी से की जाएं।
(11) वह अकेला है, अर्थात उसके जितने गुण हैं, उनमें से किसी गुण में भी उसका कोई साझी और प्रतिद्वन्द्वी नहीं। यही नहीं कि वह आदि और अनन्त, स्रष्टा और पालनहार, स्वामी और शासक, सर्वज्ञ और तत्त्ववेता यानी हिकमत वाला , शक्तिशाली और न्यायकर्ता, बदला देनेवाला और पूज्य है, बल्कि ऐसा केवल वही एक मात्र है।